लोकेषणा की कामना नहीं
पुणे से जब नागपुर लीटकर आए, तब मैं संघ स्वयंसेवकों की ओर से उनका स्वागत करने के लिए स्टेशन पर गया। थोडी देर में गाड़ी आई डॉक्टर जी डिब्बे के दरवाजे पर ही खडे थे। गाडी रुकते ही साथ लाई श्रद्धासिक्त पुष्पमाला उन्हें अर्पण करने के लिए मैंने ज्यों ही हाँथ बढ़ाए त्यों ही उन्होंने ऐसी उग्र दृष्टि से मेरी ओर देखा कि मेरा हाँथ जहां का तहाँ रह गया। फिर माला पहनाने का साहस मुझे नहीं हुआ। वह बोले “मैं तो अपने घर आया हूँ, मेरा स्वागत करने की कोई आवश्यक नहीं। यह कहकर उन्होंने पास खडे हुए अतिथि को माला पहनाने का संकेत करते हुए कहा- “ये हैं हमारे अतिथि स्वागत तो इनका करना चाहिए मैने माला उनको पहना दी। इसी प्रकार उन्होंने जीवन भर अपने गले में माला नहीं डालने दी।
फोटो खिचवाने के लिए भी स्वयसेवकों को उनसे हठपूर्वक लड़ाई करनी पडती थी। इसी निरहंकारी वृत्ति के कारण ही उन्होंने वह उच्चता प्राप्त की जिससे इतना विशाल कार्य सपादित कर सके।
उत्तरप्रदेश संघ शिक्षा वर्ग, मेरठ, सन् 1946
श्रीगुरुजी समग्र खण्ड 1

