राष्ट्रधर्म और अदम्य साहस के प्रतीक
बंदा सिंह बहादुर (बंदा वैरागी) समय की पुकार की उपेक्षा कर एकान्त साधना में लीन थे। उसी समय उनकी भेंट दशम गुरु, श्री गुरु गोविन्द सिंह जी से हुई। गुरुजी ने समाज पर हो रहे अत्याचारों, धार्मिक उत्पीड़न तथा पराधीनता की पीड़ा का वर्णन करते हुए कहा “जब देश, धर्म और संस्कृति संकट में हों तथा समाज अन्याय का शिकार हो, तब केवल एकान्त साधना पर्याप्त नहीं; ऐसे समय धर्म की रक्षा और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष ही सच्ची साधना है।”
गुरु गोविन्द सिंह जी के इन प्रेरणादायी वचनों ने बन्दा वैरागी के जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने संन्यास का मार्ग छोड़कर गुरु के शिष्य के रूप में बंदा सिंह बहादुर का स्वरूप धारण किया और देश, धर्म तथा पीड़ित समाज की रक्षा के लिए अपना सम्पूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। उन्होंने मुगल अत्याचारों का डटकर सामना किया और अनेक युद्धों में अद्वितीय वीरता का परिचय दिया।
अन्ततः वे युद्ध करते हुए बंदी बना लिए गए। उन्हें लोहे के पिंजरे में कैद कर धर्म परिवर्तन का प्रस्ताव दिया गया, किन्तु उन्होंने अपने धर्म और सिद्धांतों से समझौता करने से स्पष्ट इन्कार कर दिया। अमानवीय यातनाएँ दी गईं, उनके शरीर को निर्दयता से क्षत-विक्षत किया गया, फिर भी वे तनिक भी विचलित नहीं हुए। उन्होंने न तो अपने विश्वास का त्याग किया और न ही साहस खोया।
अन्ततः बंदा सिंह बहादुर ने देश, धर्म और स्वाभिमान की रक्षा के लिए हंसते-हंसते अपने प्राणों का बलिदान दे दिया। उनका जीवन हमें सिखाता है कि जब राष्ट्र, धर्म और मानवता संकट में हों, तब साहस, त्याग और कर्तव्यपालन ही सर्वोच्च साधना है।

