जीवन और कार्य की एकरूपता

जीवन और कार्य की एकरूपता

सन 1949 के दिन थे। संघ से प्रतिबंध हटने के पश्चात् श्री गुरुजी देशभर में आयोजित स्वागत कार्यक्रमों को संपन्न करके कुछ दिनों के लिए काशी में रहे थे। काशी में सदा की तरह उनके ठहरने की व्यवस्था श्री दत्तराज कालिया (काले) के निवास पर हुई थी। काशी में उनका पूर्ण विश्राम हो, यह ध्यान में रखते हुए कोई कार्यक्रम नहीं रखे गये। उन दिनों मैं काशी में संघ प्रचारक के नाते काम देखता था।

आते ही श्री गुरुजी ने कार्यक्रमों के बारे में पूछा, तब उन्हें बताया गया कि आपको यहाँ पूर्ण विश्राम करना है। प्रतिबंध हटने के बाद देशभर में उनके स्वागत कार्यक्रमों के कारण श्री गुरुजी अत्यधिक श्रमित-थकित थे, इसलिये यह निर्णय लिया गया था।

उत्तर सुनते ही श्री गुरुजी गंभीर हो गए और समझाने लगे कि विश्राम की यह कल्पना ठीक नहीं है। कार्यक्रम अवश्य होने चाहिये।

नगर कार्यवाह डॉ. बनर्जी बोले – इस समय आप हमारे चार्ज में हैं और हमने कोई कार्यक्रम न रखकर आपके विश्राम की योजना बनायी है।

फिर वे कुछ नहीं बोले। पर रात होते ही उन्हें खाँसी का जोर पकड़ने लगा। दूसरे दिन प्रातः देखा तो खाँसी से उनका बुरा हाल है, यह ध्यान में आया और सब चिंतित हुए। वे रातभर खाँसते रहे थे। चेहरा, आँख लाल थीं। स्वास्थ्य तेजी से गिर रहा था। डॉ. बनर्जी ने पूछा – ‘गुरुजी ! यह क्या बात है? सोचा था विश्राम से आपको लाभ होगा, किन्तु आपकी स्थिति देखकर चिंता हो रही है।

गुरुजी बोले ‘मैं क्या कहूँ? जो आप सबने सोचा उसी का यह परिणाम हो रहा है।

इस पर हम सबकी आँखों में आँसू आ गए। डॉ. बनर्जी का गला रुँध गया और वे गुरुजी से बोले – ‘हमने

तो आपके स्वास्थ्य के हित में ही सारा विचार करके विश्राम का आयोजन किया था। उसका ऐसा उलटा परिणाम कैसे? आपके स्वास्थ्य में यह गिरावट देखकर हम सभी बंधु बहुत व्याकुल हैं। बताइये हम क्या करें?’

श्री गुरुजी बोले – ‘देखो डॉक्टर! तुम सोच रहे हो कि पूर्ण विश्राम से यह शरीर अच्छा हो जाएगा। किन्तु

ऐसी बात नहीं है। सच पूछो तो इस शरीर में ऐसा कुछ ज्यादा बचा नहीं है, जिसके द्वारा यह चल सके। डॉक्टरों के हिसाब से यह शरीर कभी का समाप्त हो चुका है। जब ये कार्य से अलग करवा दिया गया तो यह शरीर अपनी स्वाभाविक अवस्था की ओर जा रहा है। सच्चाई तो यह है कि मैं दिनरात संघ कार्य में लगा-रहता हूँ, इसी के कारण यह शरीर सधा हुआ है और चल रहा है। यदि तुम चाहते हो कि यह शरीर स्वस्थ रहे तो पूर्ण विश्राम के बजाय यथाविधि कार्यक्रम चलने दो। तुरंत ही हम लोगों ने वैसा ही किया। देखते देखते ही फिर वार्तालाप और कार्यक्रमों के बीच श्री गुरुजी की वही हँसी, वही ठहाका आरंभ हो गया और दो तीन दिन में ही स्वास्थ्य पहले जैसा हो गया।

जीवन और जीवनकार्य इतने एकरूप हो सकते हैं, इसकी कभी कल्पना भी नहीं थी। हमारी आँखों के सामने यह एक जीता जागता उदाहरण था। तब हम लोगों के समझ में आया कि इस महापुरुष ने तन से एवं मन से अपने आपको कार्य से एकाकार कर लिया है। अब शरीर से जीवनकार्य नहीं चल रहा है, अपितु जीवनकार्य ही शरीर को चला रहा है।

शरीर पर नियंत्रण

सन् 1943 या 1944 के आसपास की बात है। श्री गुरुजी के दाहिने हाथ में अत्यंत कष्टदायी पीड़ा होने लगी। एलोपैथ डॉक्टरों ने सलाह दी कि दर्द का कारण दाँत है, अतः उन्हें निकलवा देना चाहिये। होमयोपैथ्स ने कहा कि दाँत निकालने की आवश्यकता नहीं है। इसी झंझट में दो वर्ष व्यतीत हो गए और श्री गुरुजी को उसी प्रकार कष्ट सहते रहना पड़ा।

इधर कुछ दिन पश्चात् उनके दाँत में भी पीड़ा होने लगी। अंत में दाँत निकलवा देना ही उचित समझा

गया। इसके लिये वे काशी गए। पीड़ा एक दाँत में थी, किन्तु डॉक्टरों ने समस्त दाँत निकालने का निश्चय किया। डॉक्टरों ने इन्जेक्शन लगाकर मसूड़ों को सुन्न करने का प्रस्ताव रखा। परन्तु गुरुजी ने उनसे कहा कि मसूड़ों को सुन्न करने के लिए इन्जेक्शन लगाने की आवश्यकता नहीं है।

उन्होंने बिना इन्जेक्शन लगवाए ही समस्त दाँत उखड़वाए। कल्पना कीजिए कितनी वेदना हुई होगी। परन्तु उनके मुख पर किंचित भी दर्द की रेखा दिखाई नहीं पड़ी। इतना ही नहीं, वे जबलपुर के समीप गाडरवाडा शिविर में पधारे और उन्होंने सबके अंदाजों के विपरीत दो घंटे तक लगातार धाराप्रवाह भाषण दिया।

श्री गुरुजी का यह मनोबल तथा शरीर पर नियंत्रण लोगों को आश्चर्य में डाल दिया करता था।

(श्री गुरुजी प्रेरक संस्मरण)

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