अप्रैल का महीना हिंदू पंचांग में पर्वो और परंपराओं की बहार लाता है। राम नवमी, हनुमान जयंती, वैशाखी, अक्षय तृतीया और अन्य अनेक त्योहार एक के बाद एक आते हैं। मंदिरों में भक्तों की भीड़, सड़कों पर शोभायात्राएँ, घरों में पूजा-अर्चना और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का सिलसिला चलता रहता है। हिंदू बाहुल्य वाले भारत में यह दृश्य उत्साहजनक है, पर साथ ही विचारणीय भी। क्या यह बढ़ती धार्मिक सक्रियता केवल मौसमी उत्सव तक सीमित रहेगी या यह हिंदू समाज को नैतिक, सामाजिक और साँस्कृतिक रूप से मजबूत बनाने का स्थायी आधार बनेगी?

आज हिंदू समाज अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है। एक तरफ आधुनिकता का आकर्षण युवाओं को परंपराओं से दूर ले जा रहा है. दूसरी तरफ जनसाँख्यिकीय परिवर्तन, घुसपैठ, लव जिहाद, मंदिर-मस्जिद विवाद और साँस्कृतिक आक्रमण की घटनाएँ निरंतर बढ़ रही हैं। ऐसे में धार्मिक गतिविधियों का विस्तार निश्चित रूप से सकारात्मक संकेत है। यह दर्शाता है कि लाखों-करोड़ों हिंदू अभी भी अपनी जड़ों से गहराई से जुड़े हुए हैं। वे आधुनिकता को अपनाते हुए भी अपनी सँस्कृति को जीवित रखना बाहते हैं। मंदिरों में लगने वाली लंबी कतारें, ऑनलाइन पूजा-अनुष्ठान, युवाओं द्वारा आयोजित भजन संध्या और सनातन परंपराओं पर आधारित चर्चाएँ यह सिद्ध करती है कि हिंदू समाज सुप्त नहीं है।

परंतु प्रश्न यह है कि यह जागरण कितना गहरा है? क्या भीड़-भाड़ वाला मंदिर केवल आस्था का प्रतीक बनकर रह जाएगा या यह सामाजिक समरसता का केंद्र भी बनेगा? क्या राम नवमी की शोभायात्रा सिर्फ एक दिन का उत्सव होगी या इससे हिंदू समाज में अनुशासन, सेवा और एकता की भावना स्थायी रूप से विकसित होगी?

इतिहास साक्षी है कि जब भी हिंदू समाज ने अपनी सांस्कृतिक चेतना को जागृत किया, तब उसने न केवल अपने को बचाया बल्कि पूरे राष्ट्र को नई दिशा दी। स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ‘उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए। आज उसी जागरण की जरूरत है। धार्मिक सक्रियता को यदि केवल भावुकता तक सीमित रखा गया, तो, यह क्षणिक सुख देगी, लेकिन स्थायी परिवर्तन नहीं ला सकेगी। आवश्यकता है कि इस ऊर्जा को व्यवस्थित रूप से समाज निर्माण में लगाया जाए।

सबसे पहले, नैतिकता और अनुशासन का प्रश्न। आज युवा पीढ़ी तीव्र गति से बदलते सामाजिक मीडिया संस्कारों से प्रभावित हो रही है। नशा, व्यसन, परिवार विघटन और मूल्यहीनता की चुनौतियों बढ़ रही है। मंदिर और धार्मिक संस्थाएँ इन युवाओं को आकर्षित कर उन्हें सनातन मूल्यों-सत्य, अहिंसा, स्वाध्याय और सेवा से जोड़ सकती है। गीता पाठ, योग शिविर, चरित्र निर्माण कार्यशालाएँ और गुरु-शिष्य परंपरा को पुनर्जीवित करना समय की मांग है। जब हनुमान जयंती पर लाखों युवा भगवान हनुमान की शक्ति और ब्रह्मचर्य का संकल्प लेंगे, तभी यह उत्सव सार्थक होगा।

दूसरा महत्वपूर्ण आयाम है सेवा कार्य। हिंदू समाज की सबसे बड़ी ताकत उसकी सेवा भावना रही है। रामकृष्ण मिशन, विहिप, आरएसएस, आर्ट ऑफ लिविंग, इस्कॉन और अनेक संत-संस्थाएँ पहले से ही इस दिशा में काम कर रही हैं। लेकिन अब इसे व्यापक स्तर पर ले जाने की जरूरत है। मंदिरों को शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मनिर्भरता के केंद्रों में बदलना चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में गोशालाएँ, आयुर्वेदिक चिकित्सा केंद्र, महिला स्व-सहायता समूह और पर्यावरण संरक्षण अभियान धार्मिक उत्साह के साथ जोड़े जा सकते हैं। जब भक्त मंदिर जाते समय किसी गरीब बच्चे को किताब या किसी असहाय को भोजन देते हुए दिखाई दें, तभी हम कह सकते हैं कि आस्था सामाजिक जिम्मेदारी में बदल रही है।

तीसरा मुद्दा है साँस्कृतिक जागरूकता और एकता। हिंदू समाज विविधता में विश्वास रखता है, लेकिन विविधता को एकता में बदलने की चुनौती बाकी है। जाति, क्षेत्र, भाषा और संप्रदाय की दीवारें अभी भी मौजूद हैं। राम मंदिर आंदोलन ने यह सिद्ध किया कि जब कोई बड़ा उद्देश्य सामने आता है, तो ये दीवारें गिर सकती है। अब इसी भावना को स्थायी बनाना है। विभिन्न हिंदू संगठनों के बीच समन्वय, एक-दूसरे के त्योहारों में भागीदारी और साझा सांस्कृतिक कार्यक्रम इस दिशा में सहायक हो सकते हैं।

आधुनिक चुनौतियों का सामना करने के लिए डिजिटल माध्यमों का भी बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग जरूरी है। युवा पीढ़ी सोशल मीडिया पर सक्रिय है। सनातन धर्म की गहराई, वैज्ञानिक आधार और प्रासंगिकता को आकर्षक तरीके से प्रस्तुत करने वाले कंटेंट की जरूरत है। सकारात्मक हिंदू कथा-कहानियाँ, ऐतिहासिक गौरव और समकालीन समस्याओं के समाधान सनातन दृष्टि से उपलब्ध कराए जाएँ तो युवा स्वाभाविक रूप से जुड़ेंगे।

विजय शंकर तिवारी

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