रक्षाबंधन पर विशेष – उन दो पतले धागों की महिमा
अपने देश के उत्तरी भागों में ‘राखी’ का संकेत बहुत ही सुंदर है। किसी भी अनजाने पुरुष को कोई भी स्त्री जाकर उसके हाथ में राखी बांध देती है तो उसी क्षण से वह पुरुष उसका भाई, उसका रक्षक बन जाता है। और यदि किसी स्त्री के स्त्रीत्व पर संकट आ जाए और वह जाकर किसी पराक्रमी पुरुष को राखी बांध देती है, तो वह अपने प्राणों की भी परवाह न करते हुए उसकी रक्षा के लिए दौड़ पड़ता है। हमारे इतिहास में इस प्रकार के अनेक उदाहरण हैं।
स्त्रीत्व, अपने यहां का एक अति पवित्र मानबिन्दु रहा है। इस भूमि की परम उदात्त संस्कृति का यह एक संकेत है। उसकी रक्षा के लिए असंख्य पुरुषों ने अप्रतिम – त्याग और बलिदान दिए हैं। उसकी गाथाएं अपने इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ है। अपने स्त्रीत्व को बचाने हेतु स्त्रियों ने तो आग की ज्वाला में सहर्ष कूद कर जोहर किया है। यह केवल राजस्थान की लोमहर्षक गाथा नहीं है। देश विभाजन के समय पंजाब में भी जगह-जगह पर ऐसा ही हुआ। माता-बहनों ने इसी प्रकार का आत्मोत्सर्ग किया; विष पिया, कुओं में कूद पड़ीं, इससे भी बढ़कर अपने स्वयं के भाई, पति, पिताओं के हाथों से अपने सर कटवा दिए। अपने सर्व साधारण लोगों में भी स्त्रीत्व-मातृत्व के प्रति जो असदृश श्रद्धा बनी हुई है, वह इसी कारण से है।
माता की वात्सल्यमयी गोद में ही मानवता खिलती है। बच्चा जब जन्म लेता है – वह पशु जैसा होता है। मां के दूध के पुण्य प्रसाद के रूप में वह मानव बनता है। इसलिए मानव के लिए माता ही पहली देवी है: ‘मातृ देवो भव’। महाभारत में यक्ष प्रश्न’ का प्रसंग काफी प्रसिद्ध है। युधिष्ठिर से यक्ष पूछता है – ‘भूमि से भी वजनदार क्या है?’ युधिष्ठिर उत्तर देता है – ‘माता’।
अपनी संस्कृति में ‘मां’ शब्द तो सभी भाषाओं में स्त्री मात्र के लिए प्रयोग में आता है। भिखारी भी किसी स्त्री से भीख मांगते समय ‘मां’ कहकर ही सम्बोधित करता है। एक-दो पीढ़ी पहले तक कर्नाटक, आंध्र आदि प्रदेशों में स्त्री के नाम का ही भाग था ‘अम्मा’, जैसे सीतम्मा, कमलम्मा आदि। प्राचीन काल में अपरिचित स्त्री को सम्बोधित करते समय तो ‘मां’ शब्द का ही प्रचलन था। अपने कई मित्रों ने मुझसे कहा कि विवाहित आदमी की आयु बढ़ने पर उसकी पत्नी ही उसके लिए मां जैसी बन जाती है। जिस प्रकार मां अपने बच्चों की चिंता करती है, सेवा करती है, उसी प्रकार वह अपने पति की करती है। एक कहावत है, वृद्धावस्था दूसरा बचपन है – यह कम से कम अपने देश में तो सच है।
यह दृष्टिकोण केवल हिन्दू स्त्री तक ही सीमित नहीं है। कोई भी स्त्री हो, उसके प्रति हमारी यही दृष्टि है। कल्याण के मुसलमान सूबेदार की अत्यंत सुन्दर पुत्री को शिवाजी के सामने बंदी बनाकर लाने पर उन्होंने उसको आभूषण से सम्मानित कर सुरक्षित ढंग से उसकी ससुराल वापस भेज दिया। आक्रमणकारी गोरों की स्त्रियों के प्रति भी यही व्यवहार होता रहा है। चिमणा जी अप्पा ने असामान्य साहस से पोंडा किला जीत लिया था। वहां के सारे पुर्तगाली सैनक व नागरिक अपनी स्त्रियों को छोड़कर भाग गए। (जैसे – देश विभाजन के समय, जूनागढ़ की मुक्ति के समय वहां का नवाब अपनी बीवीयों को छोड़कर, अपने साथ कुत्तों व जवाहरातों को लेकर, कराची भाग गया था) जब विजयशाली मराठा सेना किले के अंदर घुस गई तो वहां की महिलाएं थर-थर कांपने लगी। उनको लगा कि जिस घोर बर्बरता के साथ उनके पति, भाई, पिता पराभूत देश की महिलाओं के साथ व्यवहार करते थे, उसी प्रकार अपने साथ भी होने वाला है। परंतु चिमणा जी ने अपने सैनिको को सूचना दी कि उन सारी गोरी महिलाओं को सुरक्षित उनके पुरुषों क पास भिजवाया जाए। १८५७ में जब कानपुर मुक्त हो गया, तब भी ऐसा ही हुआ। वहां के अंग्रेज पुरुष जब भाग गए तो नाना साहय पेशवा ने वहां की स्त्रियों को सुरक्षित उनके पुरुषों के पास भेज दिया।
स्त्रीत्व की, मातृत्व की महिमा और गरिमा को दर्शाने वाले इस राखी उत्सव को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने समाजव्यापी बनाने का प्रयास किया है। परिवारों में अपना यह नित्य का अनुभव है। माता को सबसे अधिक प्यार अपने सबसे दुर्बल बच्चे पर होता है। यह मातृत्व का विशेष लक्षण है। किसी घर में यदि कोई मंदबुद्धि वाला बच्चा बच्ची है तो उस पर केवल माता का ही नहीं, अपितु पूरे परिवार का मातृवत प्रेम बना रहता है। संघ ने इसी भावना को समाज के मानस में अंकित करने के लिए इस उत्सव को एक प्रभावी साधन बना दिया है। रक्षाबंधन के दिन स्वयंसेवक अपने समाज के दुर्बल, वंचित वर्गों के बन्धु-भगिनियों के बीच में जाते हैं। हजारों स्वयंसेवक अपने यहां की सेवा बस्तियों (जहां मुख्यतः अनुसूचित जाति के बंधु रहते हैं) में जाकर वहां के पुरुषों के हाथों में राखी बांधते हैं। यहां के लोगों के साथ अपने व्यवहार से सामाजिक समता और ममता का संदेश देते हैं।
कई वर्ष पहले का यह हृदयस्पर्शी प्रसंग है। मैसूर की एक सेवा बस्ती में स्वयंसेवकों ने जाकर पुरुषों को राखी बांधना शुरू किया। बीच की एक झोपड़ी छोड़कर वे जब आगे बढ़ने लगे तो वहां की महिला ने उनको बुलाया और कहा कि ‘मेरी झोपड़ी छोड़कर क्यों जा रहे हो?’ स्वयंसेवकों ने जब उत्तर दिया, ‘क्योंकि आप अकेली हैं, कोई पुरुष नहीं दिखाई दिया’, तो उस महिला ने कहा, ‘मैं अकेली हूं तो क्या, मैं तो तुम्हारी बहन हूं न?’ ऐसा कहकर उसने उन सबको अपनी झोंपड़ी में बुला लिया। जब स्वयंसेवक उसको नमस्कार कर राखी देने आगे बढ़े तो उसने रोककर कहा – ‘राखी उत्सव की यह पद्धति नहीं है। मैं तुम लोगों को सही पद्धति बताऊंगी’। ऐसा बोलकर अंदर गई। अपने हाथ-पैर धोकर झोंपड़ी के एक कोने में रखी देव प्रतिमा की आरती उतारी। स्वयंसेवकों को आरती देते हुए उसने उनके माथे पर कुमकुम लगाया तथा अपने पास रखी राखियों को स्वयंसेवकों के हाथों में बांध दिया। फिर अपने हाथों से मिठाई को स्वयंसेवकों के मुंह में डालने के लिए आगे बढ़ी। तब स्वयंसेवक संकोच के मारे कहने लगे – ‘नहीं, नहीं, हमारे हाथ में दे दीजिए’। तो वह महिला हंस कर बोली – ‘क्यों बहन के हाथों से खाने में संकोच करते हो?’ ऐसा बालकर सबको मिठाई खिला दी। स्वयंसेवकों ने विदा लेने के पहले संघ के बारे में थोड़ी जानकारी तथा रक्षाबंधन मनाने का उद्देश्य भी बताया। तब वह महिला बहुत प्रसन्न हुई और कहने लगी मैं तो वर्षों तक मुम्बई में रही, इस कारण रक्षाबंधन की यह सुंदर पद्धति जानती हूं।’
इस संदर्भ में पेजावर मठाधीश पू. विश्वेश्वर तीर्थ जी ने महाभारत का एक बड़ा मार्मिक प्रसंग सुनाया है। युधिष्ठिर ने यक्ष के सभी प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर दे दिया। इससे प्रसन्न होकर यक्ष ने कहा, ‘सरोवर के तट पर मृत पड़े अन्य चार पाण्डवों में से किसी एक को जीवित कर सकता हूं, अतः कहो, किसको जीवित करूं’? तब युधिष्ठिर ने कहा ‘नकुल’। यक्ष ने आश्चर्यचकित होकर पूछा – ‘तुम्हारे भाइयों में भीम तुम्हें सबसे प्रिय है, तुम्हारी रक्षा करने वाला है। अर्जुन तो अजेय योद्धा है। उनमें से किसी को न चुनते हुए नफुल को क्यों चुन लिया? तब युधिष्ठिर ने उत्तर दिया, ‘कुंती के तीन पुत्रों में मैं तो जीवित हूं, परन्तु यदि भीम या अर्जुन का जीवन मांगूंगा तो माद्री निःपुत्र बन जाएगी, इसलिए नकुल का जीवन मांग लिया’। इस उत्तर से यक्ष ने अतिसंतुष्ट होकर चारों भाइयों को जीवित कर दिया। पेजावर मठाधीश जी ने आज के अपने समाज के लिए इसका संदेश समझाते हुए कहा, ‘पाण्डवों में नकुल सबसे छोटा था। उसके जीवित होने पर उसके अन्य भाई खड़े हो गए। इसी प्रकार अपने समाज में सबसे निचले स्तर में रहने वाले अपने बंधुओं को जब हम ऊंचा उठाएंगे तो पूरा समाज उठकर खड़ा हो जाएगा’।
संघ के स्वयंसेवक भी समाज के साथ व्यवहार करते समय इसी दृष्टिकोण को अपनाने का प्रयास करते हैं। समाज के सभी जाति, वर्ग, पंथों के लोगों के साथ तो उनका समान रूप से अतीव आत्मीयता का व्यवहार होता ही है। परंतु खासतौर पर बस्ती के, गांव के, दुर्बल उपेक्षित बन्धु-भगिनियों के उत्थान को लेकर वे सदैव प्रयासरत रहते हैं।
हो. वे. शेषाद्री
पाञ्चजन्य – अगस्त, 2000

