राष्ट्रीय विचारों के प्रखर लेखक एच.वी. शेषाद्रि जी
इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो केवल संगठन का नेतृत्व नहीं करते बल्कि अपने विचार, लेखनी और जीवन-साधना से पीढ़ियों को दिशा देते हैं। एच.वी. शेषाद्रि जी ऐसे ही विलक्षण व्यक्तित्व थे, जिनका सम्पूर्ण जीवन राष्ट्रकार्य, संगठन और वैचारिक चेतना को समर्पित रहा। सरलता, विद्वता और राष्ट्रनिष्ठा के अद्भुत संगम रहे शेषाद्रि जी ने अपने कर्म, चिन्तन और लेखन से भारतीय समाज जीवन पर गहरी छाप छोड़ी।
मूलत: कर्नाटक के रहने वाले शेषाद्रि जी का जन्म 26 मई 1926 को बैंगलुरू में हुआ था। वे एक प्रतिष्ठित विचारक, लेखक और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता थे। सादे जीवन, अध्ययन और तेजस्विता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने ‘मैसूर’ विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में मास्टर्स की डिग्री स्वर्ण पदक के साथ प्राप्त की थी।
संघ से जुड़ाव और कार्य :
शेषाद्रि जी बचपन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आये। उन्होंने विद्यार्थी जीवन में ही संघ प्रचारक बनने का निर्णय कर लिया और 1946 में वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक बन गये। उन्होंने युवा पीढ़ी को प्रेरणा और मार्गदर्शन प्रदान किया। सामाजिक सेवा गतिविधियों और राष्ट्रवादी कार्यों को बढ़ावा देने के लिए देश के कोने-कोने में लगातार प्रवास किया।
एक आदर्श प्रचारक :
शेषाद्रि जी प्रारम्भ में वह बैंगलोर में प्रचारक थे और बाद में 1953-56 के दौरान मंगलुरु क्षेत्र में प्रचारक के रुप में कार्य किया। 1960 में वे कर्नाटक के लिए प्रान्त प्रचारक बने और 1980 में चार दक्षिणी राज्यों कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल अर्थात् दक्षिण क्षेत्र के क्षेत्र प्रचारक बने। 1987 में सरकार्यवाह बने और तक 2000 इस दायित्व का सकुशल निर्वहन किया। उसके बाद उन्होंने अखिल भारत प्रचारक प्रमुख के रूप में कार्य किया। एक प्रचारक के रूप में उन्होंने दक्षिण भारत में संगठन के विस्तार, कार्यकर्ताओं के व्यक्तिगत और समाज जीवन में समन्वय स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। चाहे 1960–70 के दशक का संगठनात्मक संघर्ष हो या 1975 के आपातकाल का दौर, उन्होंने अद्भुत धैर्य, अनुशासन और सूक्ष्म दृष्टि से कार्यकर्ताओं को प्रेरित किया।
एक श्रेष्ठ विचारक और लेखक :
संवेदनशील मन वाले एच.वी. शेषाद्रि जी ने समाज के विभिन्न वर्गों के साथ लगातार सम्पर्क में रहकर प्राप्त किये गये अपने अनुभवों, शब्दों और विचारों को पुस्तकों और पत्रिकाओं में स्थान दिया। उन्होंने हिन्दी भाषा में श्रीगुरुजी, हिन्दू राष्ट्र क्यों ?, कम्युनिस्ट आतंकवाद, उजाले की ओर, हिन्दू विजय-युग प्रवर्तक, और देश बंट गया, संघ कार्यकर्ता और मराठी भाषा में फाळणीची शोकांतिका, उगवे संघ पहाट, शाखा मूल्यांकन, तेलुगु में छत्रपति शिवाजी, श्रीगुरुजी स्प्रिचुअल महाविभूति के अलावा कन्नड़ भाषा में प्रबन्ध संचय, देश विभाजन दुरन्त कथा, चिंतानागंगा, कृतिरुप संघ-दर्शन, और गुजराती भाषा में विभाजन नी करुणकथा लिखी। मलयालम भाषा में युगान्तर, अंग्रेजी भाषा में R.S.S. A Vision in Action, Dr. Hedgewar: The Epoch-Maker आदि पुस्तकें लिखी। उनके द्वारा लिखी गई “द ट्रेजिक स्टोरी ऑफ पार्टिशन” उन एकमात्र पुस्तकों में से एक थी जिसने विभाजन के मुद्दे को एक अलग दृष्टिकोण प्रदान किया।
पत्र-पत्रिकाओं में लेखन :
शेषाद्रि जी ने पत्रिकाओं में भी लेखन किया। उन्होंने कई दशकों तक विक्रम साप्ताहिक, उत्थान मासिक, आयोजक साप्ताहिक, पांचजन्य हिन्दी साप्ताहिक और लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में पत्रिकाओं में लेखों का योगदान दिया। उन्होंने वर्तमान सामाजिक विषयों पर सैकड़ों लेख लिखे। उनके कई लेखों का कई अन्य भाषाओं में अनुवाद किया गया है। उन्होंने राष्ट्रवादी विचारों और संघ की विचारधारा को जन-जन तक पहुंचाने में बड़ा योगदान दिया। उनके लेखन अत्यधिक लोकप्रिय थे और हजारों पाठक उनके लेखों की प्रतीक्षा करते थे।
एक कुशल वक्ता :
लेखक के साथ-साथ शेषाद्रि जी ने एक वक्ता के रूप में भी नाम कमाया। सामाजिक विषयों के साथ निबन्धों के संग्रह ‘तोरबेरालु’ ने 1982 में कर्नाटक राज्य साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता। साल 1984 में एक विशेष आमंत्रण पर न्यूयॉर्क गये और वहाँ विश्व हिन्दू सम्मेलन और उसी वर्ष ब्रैडफोर्ड (यूके) में हिन्दू संगम को सम्बोधित किया। संघ के सर्वोच्च पद पर आसीन होने के बाद भी उन्होंने एक सरल, कठोर जीवन व्यतीत किया।
एच.वी. शेषाद्रि जी का जीवन इस बात का प्रमाण है कि विचारों की शक्ति, अनुशासित जीवन और राष्ट्र के प्रति समर्पण किसी व्यक्ति को केवल एक संगठनकर्ता नहीं, बल्कि युगदृष्टा बना देता है। उनकी लेखनी, संगठन क्षमता और राष्ट्रनिष्ठ जीवन आज भी असंख्य कार्यकर्ताओं और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।

