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रूस में हिंदी का बढ़ता दायरा, भारत-रूस संबंधों को मिल रहा सांस्कृतिक आधार

मॉस्को: भारत और रूस के बीच संबंधों की पहचान लंबे समय से रणनीतिक साझेदारी, राजनीतिक विश्वास और आर्थिक सहयोग से होती रही है। अब इस रिश्ते का एक नया आयाम भाषा और शिक्षा के क्षेत्र में उभर रहा है। रूस के विश्वविद्यालयों में हिंदी के प्रति बढ़ती रुचि यह संकेत दे रही है कि भारत…

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श्री गुरु ग्रंथ साहिब: आध्यात्मिक ज्ञान और राष्ट्रीय एकसूत्रता का महान संदेश

भारत ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की धरती है। यहाँ वेद, गीता, रामचरितमानस जैसे कई धार्मिक ग्रंथों की रचना हुई। विश्व के प्रमुख धर्मग्रंथों में सबसे नवीन है गुरु ग्रंथ साहिब। न केवल आकार की दृष्टि से, बल्कि सामग्री के लिहाज से भी यह एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें ईश्वर और मोक्ष के अलावा जीवन के…

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Shraddhanjali Sabha - RSS Sarsanghchalak Ji remembered A. Balakrishnan Ji as a Sampoorna Karyakarta

Shraddhanjali Sabha – RSS Sarsanghchalak Ji remembered A. Balakrishnan Ji as a Sampoorna Karyakarta

New Delhi. A Shraddhanjali Sabha in remembrance of A. Balakrishnan Ji, President of Vivekanand Kendra, honouring a life devoted to the service of Ma Bharati and for bringing education and social development to some of the most remote regions of Arunachal Pradesh, was held at Vivekananda International Foundation (VIF). RSS Sarsanghchalak Dr. Mohan Bhagwat Ji,…

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11 सितम्बर 1893: जब शिकागो में गूंजा भारत का सनातन संदेश

11 सितम्बर 1893: जब शिकागो में गूंजा भारत का सनातन संदेश

शिकागो भाषण, 11 सितम्बर 1893   (Sankar, The Monk As the unknown life of Swami Vivekananda, Penguin Books)  ‘भारतवर्ष की विभूतियाँ’ नामक पुस्तक में शिकागों भाषण और स्वामी विवेकानन्द के विषय में लिखा है, “सन 1893 में आप शिकागो सर्व धर्म सम्मेलन में भाग लेने के हेतु प्रतिनिधि होकर अमेरिका गये। अमेरिका और इंग्लैण्ड में करीब…

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विनोबा भावे का राष्ट्र चिन्तन

विनोबा भावे का राष्ट्र चिन्तन

आचार्य विनोबा भावे भारतीय नवजागरण उन प्रमुख चिन्तकों में से हैं, जिनके विचारों में आध्यात्मिकता, नैतिकता, सामाजिक न्याय और राष्ट्र-निर्माण का अद्भुत समन्वय दिखायी देता है। उनका राष्ट्र चिन्तन संकीर्ण राजनीतिक राष्ट्रवाद से आगे बढ़कर एक ऐसे मानवतावादी और समग्र राष्ट्र की कल्पना प्रस्तुत करता है, जो मनुष्य की बाह्य स्वतंत्रता के साथ-साथ उसकी आन्तरिक…

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युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानन्द की शिकागो यात्रा

युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानन्द की शिकागो यात्रा

शिकागो धर्म महा सम्मलेन भाषण “मुझे ऐसे देश का व्यक्ति होने का अभिमान हैं, जिसने इस पृथ्वी के समस्त धर्मों और देशों के उत्पीडि़तों और शरणार्थियों को आश्रय दिया हैं। मुझे आपको यह बतलाते हुये गर्व होता हैं कि हमने अपने वक्ष में यहूदियों के विशुद्धतम अवशिष्ट को स्थान दिया था, जिन्होंने दक्षिण भारत आकर…

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बाढ़ पीड़ितों के बीच सेवा भारती का राहत अभियान जारी

बाढ़ पीड़ितों के बीच सेवा भारती का राहत अभियान जारी

गांव-गांव पहुंचकर भोजन, कपड़े और जरूरत का सामान कर रही वितरित चित्रकूट, सुखेन्द्र अग्रहरि । जिले में आई बाढ़ से प्रभावित परिवारों की मदद के लिए सेवा भारती ने राहत एवं सेवा अभियान तेज कर दिया है। 29 अगस्त से लगातार बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर संस्था द्वारा जरूरतमंद परिवारों को भोजन, कपड़े और दैनिक उपयोग…

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अमर बलिदानी कैप्टन विक्रम बत्रा (जन्मदिवस- 9 सितम्बर 1974) मैं लौटकर आऊँगा, अगर तिंरगा लहराकर नहीं लौटा तो तिरंगे में लिपटकर लौटूंगा, लेकिन मैं लौटकर आऊँगा जरुर...ये शब्द है कारगिल युद्ध के उस जाबांज सिपाही के जिन्होंने मात्र 24 साल की उम्र में अपने जीवन का बलिदान दे दिया। मात्र 24 साल की उम्र में हिंद की सरहद की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराने वाले पहले एशियाई कैप्टन विक्रम उर्फ शेरशाह बत्रा का जन्म 1974 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में एक खत्री परिवार में हुआ। माता-पिता ने भारत की सेना के सबसे तगड़े योद्धा का नाम विक्रम रखा। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा ने बचपन में ही भारतीय सेना में जाने का मन बना लिया था और हर साल स्कूल में 15august और 26january को फौजी यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल की परेड में शामिल हो जाया करते थे। माता-पिता ने भी विक्रम के सपने को साकार करने में उनका पूरा साथ दिया। सन 1995 विक्रम सेना भर्ती की तैयारी करने के लिए चंडीगढ़ आए, यहां उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विषय में एडमिशन लिया ताकि वो संयुक्त रक्षा सेवा नामक एक सैनिक परीक्षा पास कर सके, आखिर जिद, जुनून और मेहनत की जीत हुई और मात्र एक साल बाद विक्रम ने रात-दिन की कड़ी मेहनत से संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा पास कर ली। यहीं से साल 1995 में विक्रम के लिए नए जीवन की शुरुआत हुई वे देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी में आए और अगले 19 महीनों तक उनको कठिन ट्रेनिंग ली। दरअसल, सरकार ने पहले ही सोच लिया था कि, विक्रम वत्रा की बटालियन को तैयार करके कश्मीर भेजना है इसलिए अन्य सैनिकों के मुकाबले ज्यादा कठिन ट्रेनिंग दी गई। ट्रेनिंग के दौरान हर उस तकलीफ और दर्द से उनको वाकिफ करवाया गया जो उन्हें आगे झेलना होगा। इस तरह छह दिसंबर तक 1997 को 19 महीनों की लगातार कठिन ट्रेनिंग के बाद विक्रम बत्रा भारतीय सेना में जम्मू-कश्मीर में सेवाएं देने के लिए लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात कर दिए गए और उन्होंने अपने पिता को फोन कर कहा कि, मां ने मुझे अपने कंधों पर बैठा लिया है। और यही से शुरु हुआ विक्रम बत्रा का कैप्टन बत्रा बनने का सफर। सेना में भर्ती के बाद ही 1998 में विक्रम अपने जीवन में पहली बार कश्मीर पहुंचे। उस वक्त कश्मीर घाटी खून से लथपथ थी चारों तरफ आतंक का साया था। गोलियों की आवाजों से सुबह होती थी और बम धमाकों से रात। विक्रम की पहली पोस्टिंग कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर में हुई। ये पूरा इलाका आतंक का गढ़ था। पोस्टिंग के दौरान बत्रा को सैनिक बटालियन के साथ जंगलों में भेजा गया जहां उनकी आतंकवादियों से सीधी मुठभेड़ हुई। रात के घोर अंधेरे बर्फीले जंगलों में विक्रम पहली बार आतंक का सामना कर रहे थे कि तभी एक गोली आई जो सीधे उनके कंधों से गुजरकर उनके पीछे खड़े एक सिपाही को जा लगी। इस घटना से विक्रम ने गंभीर होकर अपनी बटालियन को पूरे जंगल में फैला दिया उस रात उन्होंने करीब 57 आतंकवादियों को मार डाला। लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा की अगुवाई में कश्मीर में बड़े आतंकी गिरोह का खात्मा कर दिया गया उनके नेतृत्व में लगातार 12 आतंकी ठिकानों को तबाह कर भारतीय सेना ने कश्मीर में एक बड़े हिस्से को अपने नियंत्रण में ले लिया। विक्रम अक्सर छुट्टियों में अपने घर आया करते थे और अपनी प्रेमिका डिंपल चीमा के साथ अपने होने वाले बच्चों और बुढ़ापे की बातें किया करते थे। साल 1999 में अंतिम बार विक्रम होली के दिन अपने घर आए तब उनके एक मित्र ने विक्रम से कहा युद्ध के समय तुम आगे मत रहना तब विक्रम ने कहा मैं तो विजई होकर कश्मीर की चोटी पर भारत का झंडा फहराऊँगा या फिर उसी तिरंगे में लिपटकर, लौट आऊंगा जरूर... 3 जून 1999 की सुबह लेफ्टिनेंट बत्रा को टीवी से खबर मिली कि, पाकिस्तानी सेना कश्मीर की घाटियों में घुस आई है साथ ही हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को स्थानीय लोगों ने अपने घरों में छुपा रखा है इतना सुनकर विक्रम अपनी छुट्टियों को पूरा किए बगैर ही कश्मीर के लिए रवाना हो गए उन्होंने अपने माता-पिता दोस्तों और अपनी प्रेमिका से अंतिम बार मुलाकात की साथ ही अपने खून से अपनी प्रेमिका की मांग भर दी। शायद उन्हें ये एहसास हो चुका था कि ये उनकी आखिरी मुलाकात है, 5 जून की सुबह दिल्ली से आदेश के तहत विक्रम बतरा को मेजर योगेश कुमार जोशी के नेतृत्व में ग्रास के पर्वतों पर भेज दिया गया। ग्रास का पर्वत हिंदुस्तान का सबसे ऊंचा व दुनिया का सर्वाधिक बर्फ़ीला पर्वत था इस पर्वत के अगले पार हजारों की संख्या में पाकिस्तानी सैनिक और आतंकवादी भारत की सरहदों को छलनी कर रहे थे साथ ही घाटी के कुछ गद्दार अपने ही सैनिकों पर पत्थर बरसा रहे थे कुल मिलाकर भारतीय सेना के लिए यह सबसे मुश्किल वक्त था चारों तरफ मौत थी परंतु मौत को मात देने की ताकत भारत के वीरों में थी। विक्रम बत्रा का विजय घोष था...दुर्गा माता की जय और अगली चोटी पर चढ़ाई करने से पहले उनको दिल मांगे मोर युद्ध घोष देना था। उनका कोड नाम शेरशाह रखा गया। 6 जून की रात को ही मेजर जोशी ने अपने योद्धाओं को कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में उतार दिया। घोर रात्रि में लेफ्टिनेंट बत्रा अपनी बटालियन के साथ द्रास के पर्वतों से आगे की ओर बढ़े। उन्होंने पॉइंट 5140 पर्वत पर चढ़ाई करना आरंभ किया ऊपर से पाकिस्तानी सेना गोलियां बरसा रही थी। नीचे हजारों फीट गहरी खाई और चट्टानों पर भारी फिसलन, फिर भी वीरों ने पॉइंट 5140 पर अपनी दस्तक दे दी। लेफ्टिनेंट बत्रा ने इस इलाके में हाथ बम बरसाने शुरू कर दिए साथ ही आठ दुश्मनों को मार गिराया। जवाब में पाकिस्तान की तरफ से उन पर पत्थर बरसाए गए जिससे वे घायल हो गए। रात में भारतीय वीरों ने 03:54 पर ने पॉइंट 5140 पर तिरंगा लहरा दिया है। अगली सुबह 04:35 पर विक्रम बत्रा ने अपने अधिकारियों को फोन कर बताया कि, सर हमारे योद्धाओं ने कहर मचा दिया है हमारा एक भी वीर शहीद नहीं हुआ है। बल्कि हमने चोटी पर तिरंगा फहरा दिया है सर ये दिल मांगे मोर। मेजर जोशी ने खुश होते हुए पहली बार लेफ्टिनेंट बत्रा को कैप्टन कहते हुए कहा, कैप्टन साहब आगे बढिए... ये दिल मांगे मोर...तुरंत ही सुबह पांच बजे सेना अध्यक्ष वेद प्रकाश मलिक ने उन्हें फोन करके उन्हें कैप्टन के पद पर पदोन्नत कर दिया। सुबह पांच बजकर 45 मिनट पर कैप्टन बत्रा अपने वीरों के साथ 16 हजार फीट ऊंची मुस्कोह घाटी की तरफ बढ़ने लगे, उन्होंने तेज बुखार और थकान होने के बावजूद पहली चढ़ाई शुरु की। 7 जुलाई की दोपहर में कैप्टन बत्रा प्वाइंट 4875 ऊँचाई पर पहुंचे। कुछ ही दूरी पर पाकिस्तान के सैनिक तैनात थे, इस पूरे दिन और रात तक पाकिस्तानी सैनिकों ने कैप्टन बत्रा को काफिर कहा, इतना ही नहीं उनकी धार्मिक आस्था और देवताओं को भला-बुरा कहा। इससे कैप्टन बत्रा गुस्से से बौखला गए और उन्होंने हैंड ग्रेनेड के साथ लगातार गोलियां बरसानी शुरू कर दी। कैप्टन बत्रा ने अपनी बटालियन को पीछे छोड़ अकेले ही आगे बढ़ पाकिस्तानी बंकरों में बम बरसाने शुरू कर दिए और इतने आगे बढ़ गए कि, पाकिस्तानी सैनिकों से हाथापाई करने लगे। उनको दुश्मन सैनिकों ने पीछे से पकड़ लिया। अकेले ही कैप्टन बत्रा ने तीनों दुश्मनों को मार गिराया। दुश्मनों ने लगातार कैप्टन विक्रम बत्रा को निशाना बनाकर गोलियां चलानी शुरु कर दीं। अपने सैनिकों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया ही था कि, कैप्टन विक्रम के सीने में दुश्मन की एक गोली जा लगी जिससे कैप्टन विक्रम बत्रा अपने घायल सिपाहियों की बगल में जा गिरे और वहीं दम तोड़ दिया उनके मुख से निकले अंतिम शब्द थे दुर्गा का माता की जय...और इस तरह देश का एक वीर जवान देश के लिए 7 जुलाई 1999 को अपने जीवन का बलिदान दे दिया। इधर, अपने कैप्टन की मौत से बटालियन इतना बौखला गयी कि, प्रतिशोध में मां दुर्गे की ललकार देते हुए दुश्मन सेना के परखच्चे उड़ा दिए और प्वाइंट 4875 पर तिरंगा लहरा कर ही दम लिया। इस तरह पूरी शान से हिंद की सेना ने कारगिल युद्ध विजय किया समस्त चोटियों पर तिरंगा लहरा दिया। कैप्टन साहब क बलिदान के बाद उनके नाम को परमवीर चक्र से नवाजा गया।

कैप्टन विक्रम बत्रा : “ये दिल मांगे मोर” कहकर कारगिल में रचा शौर्य का इतिहास

मैं लौटकर आऊँगा, अगर तिंरगा लहराकर नहीं लौटा तो तिरंगे में लिपटकर लौटूंगा, लेकिन मैं लौटकर आऊँगा जरुर…ये शब्द है कारगिल युद्ध के उस जाबांज सिपाही के जिन्होंने मात्र 24 साल की उम्र में अपने जीवन का बलिदान दे दिया। मात्र 24 साल की उम्र में हिंद की सरहद की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा…

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भूपेन हजारिका : संघर्ष से शिखर तक पहुंचने की प्रेरक कहानी

भूपेन हजारिका : संघर्ष से शिखर तक पहुंचने की प्रेरक कहानी

भूपेन हजारिका का जन्म 8 सितंबर 1926 को असम में हुआ था। हजारिका 10 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। अपनी मां को देखकर उन्हें गाने की प्रेरणा मिली थी। भूपेन का बचपन गुवा‌हाटी में बीता। 10 साल की उम्र में वो असमिया भाषा में गाने गाते थे। फिल्म मेकर ज्योतिप्रसाद अग्रवाल ने उनकी आवाज सुनी…

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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : महान दार्शनिक, शिक्षक और राष्ट्रनायक की प्रेरक जीवनगाथा

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : महान दार्शनिक, शिक्षक और राष्ट्रनायक की प्रेरक जीवनगाथा

घोड़े अलग-अलग रूप-रंग के होते हैं, पर गधे एक जैसे होते हैं। अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं। ये जवाब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक अंग्रेज को दिया था। दरअसल, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक बार भारतीय दर्शन पर व्याख्यान देने इंग्लैंड गए थे, तब वहां बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आए…

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