‘बस जीवित रहना, मरना नहीं’: एक सत्याग्रही पिता की अमर वाणी
मेरे पिताजी श्री सुगन्धचन्द कावड़िया बदनावर में बस अड्डे के पास होटल चलाते थे। वे पहलवान थे। वे तथा उनके एक मित्र साण्डू पहलवान दोनों मिलकर बदनावर में तीन-चार अखाड़े चलाते थे। अखाड़ों में कुश्ती के साथ-साथ मलखम्ब, तलवार, गतका आदि का भी अभ्यास किया जाता था। पिताजी अपने होटल से ही पहलवानों को खूब…