प्रणय विक्रम सिंह

भारत की राष्ट्रीय चेतना जब-जब विघटनकारी विचारों और विभाजनकारी प्रवृत्तियों से आहत हुई, तब-तब संघ नेतृत्व दीपक बनकर दिशा देता रहा है। सरसंघचालक का दायित्व केवल संगठन संचालन तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह समाज-मन की पुनर्रचना और संस्कृति की स्मृतियों का पुनर्जागरण भी करता है। श्रद्धेय मोहन भागवत जी आज 75 वर्ष की आयु में उसी अखंड परंपरा के उज्ज्वल शिखर हैं, जहां विचार तत्व से कर्म में रूपांतरित होता है, कर्म संस्कृति में प्रतिष्ठित होता है और संस्कृति राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आधार बन जाती है। वे उस सेतु के निर्माता हैं जो राष्ट्रीय चेतना को तीन स्थिर स्तंभों सांस्कृतिक पुनर्जागरण, सामाजिक समरसता और संगठनात्मक संकल्प पर प्रतिष्ठित करता है।

उनका उद्घोष गूंजता है कि “जाति की आज के समाज में कोई आवश्यकता नहीं है। हम सब एक ही माँ भारती की संतान हैं। हमें ‘हिंदू’ कहकर ही पहचाना जाए।” यह कथन केवल वाणी नहीं, साधना का सत्य है। यह उस गहन यात्रा का सार है जिसमें संघ ने दशकों तक सहभोज, सेवा और शिक्षा के माध्यम से जाति की जंजीरें तोड़ी हैं। भागवत जी का यह संदेश स्मरण कराता है कि समाज की शक्ति जातिगत में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकता में निहित है। यही एकता विश्वास का संस्कार रचती है और भारत को समरसता का संस्कार-क्षेत्र बनाती है।

उनकी आवाज़ बार-बार यह स्पष्ट करती है कि “हमारा राष्ट्र हिंदू राष्ट्र है। हिंदुत्व कोई संकीर्ण परिभाषा नहीं, बल्कि जीवन की समग्र दृष्टि है, जो सबको साथ लेकर चलती है।” यहां हिंदुत्व धर्म की परिभाषा से परे है। यह जीवन की पूर्णता का पथ है, जिसमें विविधता का वैभव भी है और वसुधैव कुटुंबकम् की विराटता भी। यही कारण है कि संघ की गतिविधियां गांव-गांव, समाज-समाज और जीवन-जीवन में समरसता का सेतु बन चुकी हैं। यह दृष्टि भारत को एकता में अखंडता, विविधता में समरसता और भिन्नता में बंधुत्व का अद्भुत अनुभव कराती है।

भागवत जी का दृढ़ कथन है कि “संघ का उद्देश्य राजनीति करना नहीं, बल्कि राष्ट्र का निर्माण करना है।” यह वाक्य भारतीय लोकतंत्र की आत्मा का उद्घोष है। सत्ता परिवर्तन क्षणिक है, किंतु समाज-परिवर्तन ही राष्ट्र को स्थायी दिशा देता है। उनके नेतृत्व में संघ की शाखाएं केवल व्यायाम और प्रार्थना तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि सेवा, समरसता और स्वावलंबन की प्रयोगशालाएं बन गईं। यहां स्वयंसेवक अनुशासन नहीं, बल्कि राष्ट्रधर्म का संस्कार सीखते हैं। उनके ही शब्द हैं कि “शाखा समाज परिवर्तन की प्रयोगशाला है, जहां स्वयंसेवक राष्ट्र का भविष्य गढ़ता है।”

इसी भावभूमि पर 2015 में उन्होंने स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र-निर्माण राजनीतिक घोषणाओं से नहीं, बल्कि आर्थिक व्यवहार और सांस्कृतिक दृष्टि से संभव है। 2018-19 में समरसता भोजों में उनकी सक्रिय भागीदारी ने जातिगत अवरोध तोड़ने का सशक्त संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि “जाति की दीवारें तोड़ना ही सच्चे राष्ट्र-निर्माण का पहला कदम है।” काशी में 2023 के उद्बोधन में उन्होंने परिवार और समाज को राष्ट्र की जड़ों से जोड़ते हुए कहा कि “कुटुंब प्रबोधन ही राष्ट्रीय प्रबोधन की नींव है, क्योंकि समाज परिवार से बनता है और राष्ट्र समाज से।” नागपुर विजयादशमी उत्सव 2024 में उन्होंने पर्यावरण और जल संरक्षण को राष्ट्रीय चरित्र का हिस्सा बताते हुए उद्घोष किया कि “धरती को माता मानना केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि आचरण का संकल्प है।”

यह दृष्टि केवल भारत की सीमा तक सीमित नहीं रही। 2022 में अमेरिका प्रवास के दौरान उन्होंने प्रवासी भारतीयों से कहा कि
“विश्व एक परिवार है यह भारतीय संस्कृति का मूल संदेश है। यदि यह दृष्टि आज जीवित नहीं रही, तो मानवता का भविष्य संकट में पड़ जाएगा।” यही भाव उन्होंने ब्रिटेन और मॉरीशस में भी दोहराया और हिंदू समाज से वैश्विक संवाद में सक्रिय भागीदारी का आह्वान किया। इन यात्राओं के परिणामस्वरूप ग्राम विकास, जल संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों से सांस्कृतिक संपर्क संघ की दीर्घकालिक कार्ययोजना का अंग बने।

उनका उद्घोष आज भी गूंजता है कि “विश्व को जोड़ने वाला भाव केवल भारत दे सकता है। वसुधैव कुटुंबकम कोई आदर्श वाक्य नहीं, बल्कि भारत की जीवन-शैली है।” 2018 नागपुर विजयादशमी भाषण में उन्होंने कहा था कि “भारत को अपनी सांस्कृतिक चेतना के बल पर विश्व को दिशा देनी है।” जब विश्व विभाजन और संघर्ष में उलझा है, तब भारत विश्वबंधुत्व और एकात्म मानववाद के सूत्र से नई राह दिखा सकता है।

भागवत जी की दृष्टि में “स्वावलंबन ही आत्मनिर्भर भारत का आधार है। समाज का हर वर्ग आत्मनिर्भर बने, तभी राष्ट्र सशक्त होगा।” कोविड-19 महामारी के समय उनका आह्वान था “केवल सरकार पर निर्भर न रहें, प्रत्येक स्वयंसेवक और समाज का प्रत्येक व्यक्ति आत्मनिर्भरता के लिए आगे आए।” उनके आह्वान पर लाखों स्वयंसेवक गांव-गांव में भोजन, औषधि और आवश्यक वस्तुओं के वितरण में जुट गए। यह आत्मनिर्भरता का जीवंत रूप था, जहां आर्थिक प्रगति ही नहीं, बल्कि सामुदायिक आत्मविश्वास और सामाजिक स्वावलंबन का संकल्प धधकता था।

देशभक्ति और देवभक्ति अलग-अलग नहीं – डॉ. मोहन भागवत जी
देशभक्ति और देवभक्ति अलग-अलग नहीं – डॉ. मोहन भागवत जी

उनकी चेतना हमें स्मरण कराती है कि “सत्ता परिवर्तन से राष्ट्र नहीं बदलता, राष्ट्र तभी बदलता है जब समाज स्वयं परिवर्तन का संकल्प ले।” प्रयागराज संगम सम्मेलन 2022 में उन्होंने कहा कि “शक्ति संसद में नहीं, समाज में है। यदि समाज सुधर जाए तो सत्ता स्वतः सुधर जाती है।” यही भाव संघ की सेवा-योजनाओं, शिक्षा-संस्कार अभियानों और ग्राम पुनर्जागरण प्रयासों में प्रत्यक्ष दिखता है। उनके नेतृत्व में ‘एक गांव—पूर्ण स्वावलंबन’ अभियान ने हजारों गांव में शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के क्षेत्र में नया जीवन फूंका।

इसीलिए मोहन भागवत जी का जीवन यह संदेश देता है कि सत्ता क्षणभंगुर है, समाज शाश्वत है। घोषणाएं क्षीण हैं, संस्कार असीम हैं। उनका उद्घोष ध्रुवतारे सा स्पष्ट है कि भारत का मार्ग केवल भारत के लिए नहीं, संपूर्ण मानवता के महाकल्याण के लिए है।

वे हमें स्मरण कराते हैं कि भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्वबंधुत्व का ऐसा वटवृक्ष है, जहां समरसता जड़ है, संस्कार तना है और संस्कृति छाया है। यही भाव हम सभी को ‘राष्ट्रधर्म और समरसता का साधक’ बनने के लिए प्रेरित करता है।

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