संघ के स्वयंसेवक विकट परिस्थिति में भी बिना नाम, यश की चिंता किए सेवा करते हैं – आलोक कुमार जी

संघ के स्वयंसेवक विकट परिस्थिति में भी बिना नाम, यश की चिंता किए सेवा करते हैं – आलोक कुमार जी

पंच परिवर्तन – पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है

पटना, 8 अप्रैल, 2026।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह आलोक कुमार जी ने कहा कि संघ ने शताब्दी वर्ष में पंच परिवर्तन का कार्यक्रम निर्धारित किया है। ये पांच परिवर्तन हैं – स्व का बोध तथा स्वदेशी का उपयोग, कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और नागरिक कर्त्तव्य बोध। पंच परिवर्तन के माध्यम से समाज और राष्ट्र सशक्त होगा। पंच परिवर्तन के माध्यम से ही आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना की जा सकती है।

संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त पटना के विजय निकेतन में आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में बद्रीनाथ उपभाग के प्रमुख जन उपस्थित रहे। गोष्ठी में सह सरकार्यवाह ने कहा कि प्रकृति के विकास में ही सबका विकास है। भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता का स्थान दिया गया है। प्रकृति को छोड़कर कोई विकास संभव नहीं है। पर्यावरण संरक्षण केवल सरकार की नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी है। हम लोगों का नारा है – “वृक्ष लगाओ, जल बचाओ और प्लास्टिक हटाओ”।

उन्होंने कहा कि संस्कारों की प्रथम पाठशाला अपना परिवार होता है। यदि परिवार सशक्त है तो समाज सशक्त होगा। आज एकल परिवार, पीढ़ियों का टकराव और नैतिक शून्यता चिंता का विषय है। भारतीय संस्कृति में परिवार केवल सुविधा नहीं, बल्कि संस्कारों की प्रयोगशाला है। डॉ. हेडगेवार जी स्वयं कहते थे – अच्छा स्वयंसेवक वही है जो घर, समाज और राष्ट्र तीनों के प्रति उत्तरदायी हो। यदि परिवार  सुसंस्कृत है तो व्यक्ति को अलग से चरित्र निर्माण की पाठशाला की आवश्यकता नहीं पड़ती। वास्तव में कुटुंब प्रबोधन वह आधार है, जहां से चरित्रवान नागरिक का निर्माण होता है।

सामाजिक समरसता पंच परिवर्तन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत की विविधता – जाति, भाषा, पंथ, क्षेत्र हमारी शक्ति है; यदि उसमें भेद नहीं भाव हो। सामाजिक समरसता का तात्पर्य हर व्यक्ति को सम्मान देना है। जन्म या पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि मानवीय गुणों के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए। जब समाज समरस होता है, तभी राष्ट्र एकजुट होकर चुनौतियों का सामना कर सकता है।

आलोक कुमार जी ने कहा कि स्व के बोध का तात्पर्य अपने अस्तित्व, अपने कर्तव्य और अपनी भूमिका को सही रूप से समझना है। इसके साथ स्वदेशी वस्तुओं के बारे में आग्रह भी करना है। स्व आधारित जीवन का तात्पर्य है कि आर्थिक एवं सांस्कृतिक सभी आयामों में हमें स्वयं के पैरों पर खड़ा होना है। आत्मनिर्भरता के अभाव में दूसरों पर हमारी निर्भरता बढ़ जाएगी। सबसे महत्वपूर्ण है नागरिक कर्तव्य बोध। हर व्यक्ति राष्ट्र सेवक है। पूरा समाज अपना परिवार है, इसीलिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक किसी भी राष्ट्रीय आपदा में हमेशा सबसे आगे रहते हैं। कोरोना काल में जब बड़ी-बड़ी संस्थाओं ने हाथ खड़े कर दिए, तब संघ के स्वयंसेवक अपने कर्तव्य बोध को समझते हुए सेवा के लिए तत्पर दिखे। संघ का स्वयंसेवक आपदा, महामारी, सामाजिक संकट जैसी विकट परिस्थिति में बिना नाम, यश की चिंता किए सेवा करता है। यही कर्तव्य बोध का जीवंत उदाहरण है।

गोष्ठी में दक्षिण बिहार के प्रांत संघचालक राजकुमार सिन्हा, बद्रीनाथ उपभाग के सह संघचालक भरत पूर्वे मंच पर उपस्थित रहे।

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