कैलिफ़ोर्निया
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने थ्राइव सम्मेलन 2026 में “विज्ञान, ज्ञान-प्रणालियाँ एवं सभ्यतागत नेतृत्व” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। यह सम्मेलन स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय, अमेरिका में आयोजित हुआ, जहाँ वैश्विक स्तर पर होसबाले जी और नवाचार से जुड़े विशेषज्ञ एकत्र हुए।
अपने संबोधन की शुरुआत में उन्होंने ग्लोबल साइंस एंड इनोवेशन फ़ोरम का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इस मंच का उद्देश्य विभिन्न सभ्यताओं के ज्ञान को साझा करना और एक-दूसरे से सीखना है। उन्होंने भारतीय सभ्यता की विशेषता बताते हुए कहा कि यहाँ आध्यात्मिक और वैज्ञानिक ज्ञान को अलग-अलग नहीं, बल्कि एक समग्र दृष्टि के रूप में देखा जाता है।
होसबाले जी ने कहा कि उपनिषद जैसे प्राचीन ग्रंथों में मानव शरीर, मन, कर्म और अनुभव के गहन विश्लेषण मिलते हैं, जिन्हें केवल धार्मिक ग्रंथ मानना उचित नहीं है। उन्होंने यह भी उल्लेख किया कि ऐतिहासिक परिस्थितियों, विदेशी आक्रमणों और दीर्घकालीन परतंत्रता के कारण भारतीय ज्ञान-परंपरा को भारी क्षति पहुँची और उसका वैज्ञानिक पक्ष काफी हद तक दब गया।
उन्होंने वर्तमान में भारत में लागू नई शिक्षा नीति के माध्यम से भारतीय ज्ञान-प्रणाली के पुनर्जीवन के प्रयासों को रेखांकित किया। उनके अनुसार, भारत की सभ्यतागत विरासत में ब्रह्मांड, अंतरिक्ष और सूक्ष्म-स्थूल जगत के संबंधों को लेकर गहरी जिज्ञासा रही है, जिसका प्रमाण प्राचीन नगरों, विश्वविद्यालयों और उन्नत नागरिक अभियांत्रिकी में भी मिलता है।
अपने भाषण में उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पारंपरिक दृष्टिकोण प्रकृति के संरक्षण और संतुलित उपयोग पर आधारित है, न कि उसके शोषण पर। उन्होंने कहा कि विज्ञान और अध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं और शिक्षा का दायित्व है कि वह इस संतुलन को समाज तक पहुँचाए। तकनीकी प्रगति और सामाजिक असमानता के संदर्भ में उन्होंने चेतावनी दी कि यदि समाज का एक वर्ग शिक्षा से वंचित रह जाता है, तो असमानताएँ बढ़ती हैं। उन्होंने ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि सभी सभ्यताओं का ज्ञान सभी तक समान रूप से पहुँचना चाहिए।
होसबाले जी ने प्रौद्योगिकी के मूल्यांकन के लिए तीन महत्वपूर्ण कसौटियाँ—अर्थव्यवस्था, पारिस्थितिकी और नीतिशास्त्र—बताईं। उन्होंने कहा कि जो तकनीकें असमानता बढ़ाती हैं, पर्यावरण को नुकसान पहुँचाती हैं या नैतिकता का उल्लंघन करती हैं, वे अंततः मानवता के लिए हानिकारक साबित होती हैं।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि विवेक के बिना ज्ञान अहंकार को जन्म देता है, जबकि विवेकपूर्ण ज्ञान ही मानवता के वास्तविक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।