सामाजिक समरसता के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर अपनत्व की भावना रखते थे और विश्वास करते थे कि यह संगठन सामाजिक परिवर्तन का आंदोलन बनेगा। उन्हें विश्वास था कि संघ हिन्दू समाज में एकजुटता और सामाजिक समरसता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर संघ की शाखा और शिक्षा वर्ग में पहुँचकर एवं संघ के कार्यकर्ताओं से संवाद कर अपने विचार की पुष्टि करते रहते थे।

डॉ. अंबेडकर का संघ के साथ पहला महत्वपूर्ण संपर्क 1935 में हुआ, जब वे पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में आए थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई। इस वर्ग में उन्हें जो अनुभूति हुई, उससे संघ के प्रति अपनत्व का भाव बन गया, जो उनके मन में जीवनपर्यंत बना रहा है। संघ के साथ संपर्क-संवाद भी बना रहा। पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण ले रहे थे। स्वाभाविक ही डॉ. अंबेडकर ने जानना चाहा कि हिन्दू समाज के संगठन के लिए कार्य कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इन 525 कार्यकर्ताओं में अस्पृश्य समुदाय के कितने लोग हैं। कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच से गुजरने के बाद भी जब बाबा साहब यह पहचान नहीं कर सके कि अस्पृश्य वर्ग के बंधु कौन और कितने हैं? तब डॉ. हेडगेवार ने उनसे आग्रह किया कि वे स्वयं ही स्वयंसेवकों से यह पूछ लें। इसके बाद, जब डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि “जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएं”, तो एक भी स्वयंसेवक आगे नहीं आया। इस पर बाबा साहब ने कहा, “वे तो पहले ही ऐसा कहते थे कि आरएसएस में अस्पृश्य समाज के बंधु नहीं हैं”। तब डॉ. हेडगेवार ने स्पष्ट किया कि संघ में किसी को भी अस्पृश्य होने का अनुभव ही नहीं कराया जाता। उन्होंने डॉ. अम्बेडकर को सुझाव दिया कि यदि वे चाहें तो उपजातियों का नाम लेकर पूछ सकते हैं। इसके बाद डॉ. अम्बेडकर ने कहा, “इस शिविर में जो चमार, महार, मांग, मेहतर हों, वे एक-एक कदम आगे आएं”। यह सुनते ही लगभग सौ स्वयंसेवक तुरंत एक साथ आगे आ गए। यह सब देखकर बाबा साहब को स्पष्ट हो गया कि सामाजिक समरसता के लिए संघ के प्रयास बहुत प्रभावी हैं क्योंकि संघ में नतो जाति के आधार पर भेदभाव है और नही किसी प्रकार की अस्पृश्यता का भाव।

बाबा साहब डॉ. अंबेडकर से जुड़े रहे पूर्व लोकसभा सांसद बालासाहेब साळुंके ने भी डॉ. अंबेडकर और संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की मुलाकात का उल्लेख किया है। उनके पुत्र काश्यप सालुके ने भानुदास गायकवाड़ के साथ मिलकर बालासाहेब सालुंके के संस्मरणों एवं विचारों का संकलन किया है- ‘आमचं सायेब दिवंगत खासदार बालासाहेब साळुंके’। इस पुस्तक के पृष्ठ 25 और 53 पर डॉ. अंबेडकर और आएसएस के संदर्भ में उपरोक्त उल्लेख आते हैं। याद रहे कि बाला साहेब सालुंके और उनके पुत्र काश्यप सालुंके का संघ से संबंध नहीं है। पुस्तक में बाला साहेब साळुंके के हवाले से लिखा गया है- “पुणे में भाऊसाहेब गडकरी के बंगले पर डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की मुलाकात हुई। फिर भाऊसाहेब अभ्यंकर, बाळासाहेब साळुंके के साथ बाबा साहब डॉ. अंबेडकर को भावे स्कूल में लगे स्वयंसेवकों के ग्रीष्मकालीन शिविर में भेंट के लिए ले गए। बाबा साहब ने यहाँ सैन्य अनुशासन और संगठन पर भाषण दिया”।

संघ की शाखा एवं संघ शिक्षा वर्ग में बाबा साहब के आने और भाषण देने का उल्लेख दत्तोपंत ठेंगडी ने अपनी पुस्तक ‘एकात्मता के पुजारी डॉ. बाबा साहब अंबेडकर’ में भी किया है। उन्होंने लिखा है कि सन् 1937 में करहाड शाखा (महाराष्ट्र) के विजयादशमी उत्सव पर बाबा साहब का भाषण हुआ। सन 1940 में बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर पुणे में संघ की शाखा में भी गए थे। यहाँ स्वयंसेवकों के समक्ष अपने विचार प्रकट किए। विश्व संवाद केंद्र, विदर्भ ने 9 जनवरी 1940 को प्रकाशित प्रसिद्ध मराठी दैनिक समाचारपत्र ‘केसरी’ की प्रति साझा की है। जिसमें प्रकाशित समाचार के अनुसार, बाबा साहब डॉ. अंबेडकर 2 जनवरी, 1940 को सतारा जिले के करहाड गाँव स्थिति भवानी शाखा में गए। जहाँ स्वयंसेवकों से संवाद करते हुए उन्होंने कहा- “कुछ बातों पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन संघ की तरफ अपनत्व की भावना से देखता हूँ”। इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में 2 जनवरी, 2025 को लोक कल्याण मंडल न्यास की ओर से श्री भवानी संघ स्थान पर ‘बंधुता परिषद’ नाम से एक वैचारिक कार्यक्रम किया गया। इस आयोजन में अंबेडकरवादी संगठन के नेता शामिल हुए और अपने विचार भी प्रकट किए।

शाखा और वर्ग के बाहर भी डॉ. अंबेडकर का संपर्क संघ के कार्यकर्ताओं के साथ रहा। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ को कुचलने का प्रयास किया गया, तब द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य’ श्रीगुरुजी’ संघ से प्रतिबंध हटाने के लिए प्रयास कर रहे थे। इस क्रम में सितंबर-1949 में दिल्ली में डॉ. अंबेडकर की मुलाकात श्रीगुरुजी से हुई। दत्तोपंत ठेंगड़ी की पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’ में इस मुलाकात का उल्लेख मिलता है। इसके साथ ही, धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर : लाइफ एंड मिशन’ में भी इस मुलाकात का उल्लेख किया है। हालांकि, दोनों ने इस बात का कोई संकेत नहीं दिया कि उनमें क्या बातचीत हुई थी। लेकिन यह स्पष्ट किया है कि यह मुलाकात संघ पर लगे प्रतिबंध को हटाने के प्रयासों के संदर्भ में थी। बाबा साहब डॉ. अंबेडकर के प्रति संघ में सदैव सम्मान का भाव रहा है। संघ ने अपने एकात्मता स्रोत (पूर्व में जिसे प्रातः स्मरण कहते थे) में भी बाबा साहब को भी शामिल किया है। अर्थात् संघ के लिए बाबा साहब प्रातः स्मरणीय और राष्ट्रीय एकात्मता को पुष्ट करनेवाले महापुरुष हैं। एकात्मता स्रोत का पाठ करते समय स्वयंसेवक बाबा साहब के कृतित्व एवं व्यक्तित्व का स्मरण कर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं।

इस विजयादशमी के उत्सव पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भी अपने उद्बोधन में बाबा साहब डॉ. अंबेडकर का स्मरण किया। अपने उद्बोधन में समाज की एकता पर बात रखते हुए सरसंघचालक जी ने कहा कि “हमारी इस एकता के आधार को डॉ. अम्बेडकर साहब ने अन्तर्निहित सांस्कृतिक एकता कहा है”।


डॉ. लोकेन्द्र सिंह, सहायक प्राध्यापक, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रिय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय

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