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स्वयंसेवकों ने शारीरिक प्रधान कार्यक्रम में निपुणता का परिचय दिया

स्वयंसेवकों ने शारीरिक प्रधान कार्यक्रम में निपुणता का परिचय दिया

लखनऊ, 21 मार्च: अभ्यास से निपुणता आती है और निपुणता जीवन संवारती है और उससे लोक कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है। व्यष्टि से समष्टि के कल्याण की भावना के साथ ध्येय पथ पर निरंतर बढ़ रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लखनऊ उत्तर भाग के स्वयंसेवकों द्वारा शारीरिक प्रधान कार्यक्रम में प्रतिभाग किया गया। यह…

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लखनऊ विवि के महान सपूत व पुरातत्ववेत्ता डा. वासुदेवशरण अग्रवाल

ऐतिहासिक मान्यताओं को पुष्ट एवं प्रमाणित करने में पुरातत्व का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। सात अगस्त, 1904 को ग्राम खेड़ा (जिला हापुड़, उ.प्र) में जन्मे डा. वासुदेव शरण अग्रवाल ऐसे ही एक मनीषी थे, जिन्होंने अपने शोध से भारतीय इतिहास की अनेक मान्यताओं को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया। वासुदेव शरण जी ने 1925 में काशी…

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विशुद्ध हिन्दी के समर्थक राजा लक्ष्मण सिंह

अमित कुमार उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध हिन्दी भाषा के निर्माण और उसकी पहचान का युग था। इसी काल में कुछ ऐसे साहित्यकार सामने आए, जिन्होंने हिन्दी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा माना। राजा लक्ष्मण सिंह ऐसे ही यशस्वी साहित्यकार, अनुवादक और भाषा-चिन्तक थे। उन्होंने उस समय हिन्दी के पक्ष…

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गोस्वामी तुलसीदास के राम

गोस्वामी तुलसीदास के राम

मध्य काल में जब विदेशी आक्रमणकारियों और सल्तनतों ने हिंदू समाज की रोटी, बेटी और चोटी पर निशाना बनाया, जब समाज निराश था, तब भक्त कवियों ने ईश्वर के सहारे देश को जगाया। संत कवि गोस्वामी तुलसीदास उन्हीं भक्त कवियों में से ही एक थे। वे सुगण भक्ति धारा के कवि और संत थे। तुलसी…

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संभल हिंसा की रिपोर्ट ने किया देशद्रोहियों का पर्दाफाश; विहिप ने की कठोर कार्रवाई की मांग

संभल हिंसा की रिपोर्ट ने किया देशद्रोहियों का पर्दाफाश; विहिप ने की कठोर कार्रवाई की मांग

नई दिल्ली। अगस्त 6, 2026। विश्व हिंदू परिषद ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में प्रस्तुत संभल हिंसा संबंधी न्यायिक आयोग की रिपोर्ट का स्वागत करते हुए इसे सत्य की विजय कहा है। विहिप के केंद्रीय संयुक्त महा मंत्री डॉ सुरेन्द्र जैन ने आज कहा कि यह रिपोर्ट उन देशद्रोही शक्तियों के चेहरे से नकाब उतारती है…

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बौद्ध दर्शन की भाषा संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के डॉ.आंबेडकर के प्रस्ताव पर अचरज कैसा?

बौद्ध दर्शन की भाषा संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के डॉ.आंबेडकर के प्रस्ताव पर अचरज कैसा?

ऐसी है संस्कृत की समृद्ध परंपरा. किसी एक धर्म या दर्शन का इस पर अधिकार नहीं रहा. ब्राह्मण दर्शन है, तो बौद्ध दर्शन भी है. नास्तिक दर्शन भी है. वेदों की प्रशस्ति है तो उसे धूर्त भांडों की रचना भी इसी जुबान में कहा गया है. यहाँ अर्थशास्त्र और कामशास्त्र भी है. मेघदूत और अभिज्ञान…

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Be vigilant regarding ideological and radical forces trying to weaken Bharat – Indrasena Reddy Ji, Governor of Tripura

Be vigilant regarding ideological and radical forces trying to weaken Bharat – Indrasena Reddy Ji, Governor of Tripura

Struggle was not merely political- Sunil Amebkar Ji Bhagyanagar, August 23, 2026. Tripura Governor N. Indrasena Reddy Ji called upon society to remain alert against elements seeking to promote anarchy, recalling the sacrifices of students and Sangh Swayamsevaks who stood against Naxal violence and extremist ideology in Telangana and Andhra Pradesh. He was speaking at…

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होलिकोत्सव की प्राचीनता

होलिकोत्सव की प्राचीनता

अतीत के आख्यानों में जहाँ तक दृष्टि जाती है होलिकोत्सव का विवरण मिलता है। वर्तमान सभ्यता के पहले आर्य सभ्यता के साहित्य में तो होली का विवरण है ही मोहन जोदड़ों की खुदाई कुछ चिन्ह ऐसे भी मिले हैं मानों एक दूसरे पर पानी फेंका जा रहा है। लगता है यह होलिकोत्सव के ही प्रतीक…

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समाज संघ की ओर सकारात्मक व विश्वास की दृष्टि से देखता है – डॉ. मोहन भगवत जी

समाज संघ की ओर सकारात्मक व विश्वास की दृष्टि से देखता है – डॉ. मोहन भगवत जी

पुणे, 2 फरवरी 2026। मोतीबाग कार्यालय में ‘समर्थ भारत’ की अद्यतन वेबसाइट के उद्घाटन कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि समाज राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर सकारात्मक और विश्वास की दृष्टि से देखता है। यह हमारे लिए अवसर और चुनौती दोनों है। ‘समर्थ भारत’ जैसी सुनियोजित परियोजनाओं…

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युग-ऋषि, महंत अवेद्यनाथ: समरसता के महानाद और सनातन के संबल

युग-ऋषि, महंत अवेद्यनाथ: समरसता के महानाद और सनातन के संबल

​काल के अनंत प्रवाह में कुछ महापुरुषों का जीवन किसी एकांत निर्जन में ठहरा हुआ सरोवर नहीं होता, बल्कि वह पर्वतों की छाती चीरकर बहने वाले उस पावन झरने की तरह होता है, जो जब आगे बढ़ता है, तो सदियों की सूखी माटी में भी प्राण फूंक देता है। भारतीय संस्कृति के इतिहास में गोरक्षपीठ…

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