जब केशवराव पहुँचे क्रांति की भूमि कलकत्ता

प्रसन्नचित्त से केशवराव कलकत्ता पहुँचे। कलकत्ता उनकी दृष्टि में केवल महानगरी नहीं थी। वह आत्मबलिदान की वेदी थी। वहाँ के युवक मातृभूमि को विदेशी शासन से मुक्त करना चाहते थे। उन्होंने बंगभूमि की धूलि अपने माथे पर लगाई। क्योंकि इस भूमि पर चैतन्य महाप्रभु घूमे, झूमे, नाचे थे। वहाँ का हर बालक और युवक महिषासुरमर्दिनी…

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करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

करोड़ों देशभक्त नागरिकों के दिलों में है आरएसएस का पंजीयन

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) पंजीकृत क्यों नहीं है? यह अपने आय-व्यय का हिसाब-किताब क्यों नहीं देता है? आरएसएस पारदर्शिता नहीं रखता है। ये ऐसे सवाल हैं, जो संघ को बदनाम करने या उसके प्रति समाज में संदेह पैदा करने के लिए अकसर उछाले जाते हैं। हालांकि, इन सवालों का कोई औचित्य नहीं है। समाज से…

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पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने पूरे देश को अचंभित और आनंदित किया है।

पश्चिम बंगाल के चुनाव परिणामों ने पूरे देश को अचंभित और आनंदित किया है।

दिसंबर 2025 और फरवरी 2026 में मुझे बंगाल जाने का अवसर मिला था। वहाँ अधिकांश लोग परिवर्तन की इच्छा तो रखते थे, किंतु यह परिवर्तन वास्तव में संभव हो सकेगा, ऐसा विश्वास बहुत कम लोगों को था। परिस्थितियाँ भी ऐसी थीं कि परिवर्तन किसी चमत्कार से कम नहीं लगता था। निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान के…

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टेक्नोफ्रेंडली संत... सामने लैपटॉप, जिक्र में इकबाल-अज्ञेय और कहानियां हैरी पॉटर की

टेक्नोफ्रेंडली संत… सामने लैपटॉप, जिक्र में इकबाल-अज्ञेय और कहानियां हैरी पॉटर की

आंखन देखी अयोध्या… नौंवी कहानी अयोध्या के टेक्नोफ्रेंडली संत, सामने लैपटॉप, जिक्र में इकबाल-अज्ञेय और कहानियां हैरी पॉटर की आचार्य मिथिलेशनन्दिनी रामलला के 21 युवा पुजारियों को ट्रेनिंग दे रहे हैं उपमिता वाजपेयी, अयोध्या। जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी।बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिंखेल सकल नृपलीला। मतलब, चारों वेद…

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राष्ट्र जागरण में पूरे समाज की भागीदारी जरूरी : स्वान्त रंजन जी

राष्ट्र जागरण में पूरे समाज की भागीदारी जरूरी : स्वान्त रंजन जी

प्रयागराज, 7 जून। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचारक प्रमुख स्वान्त रंजन ने देशवासियों से आतंकवाद, अर्बन नक्सलवाद, मतांतरण और बाजारवाद जैसी चुनौतियों का सामूहिक रूप से मुकाबला करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि भारत को विकासशील से विकसित राष्ट्र बनाने के लिए पूरे समाज को संघ के साथ मिलकर इन चार बड़ी…

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हवन-तीर्थ-कीर्तन-दर्शन के चार पहियों पर हिन्दू धर्म की बैलगाड़ी चलती है और चलती रहेगी निरन्तर

हवन-तीर्थ-कीर्तन-दर्शन के चार पहियों पर हिन्दू धर्म की बैलगाड़ी चलती है और चलती रहेगी निरन्तर

यह स्थापना हिन्दी के प्रख्यात ललित निबन्धकार आचार्य कुबेरनाथ राय की भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था और उनकी मौलिक चिन्तन-दृष्टि को प्रकट करती है। भारतीयता, सनातन धर्म, लोकजीवन और विश्वबन्धुत्व जैसे विषयों पर उन्होंने अपने निबन्धों के माध्यम से गम्भीर तथा ललित भाष्य प्रस्तुत किए। हिन्दी साहित्य की आधुनिक विधा ललित निबन्ध को समृद्ध…

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युग-ऋषि, महंत अवेद्यनाथ: समरसता के महानाद और सनातन के संबल

युग-ऋषि, महंत अवेद्यनाथ: समरसता के महानाद और सनातन के संबल

​काल के अनंत प्रवाह में कुछ महापुरुषों का जीवन किसी एकांत निर्जन में ठहरा हुआ सरोवर नहीं होता, बल्कि वह पर्वतों की छाती चीरकर बहने वाले उस पावन झरने की तरह होता है, जो जब आगे बढ़ता है, तो सदियों की सूखी माटी में भी प्राण फूंक देता है। भारतीय संस्कृति के इतिहास में गोरक्षपीठ…

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वह अमर छलांग – स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर

वह अमर छलांग – स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर

पानी पर लिखी हुई बातें लिखते- लिखते बह जाती हैं। नहीं शेष उनकी किंचित स्मृतियाँ भी रह जाती हैं। पर एक सदी से सागर के वक्षस्थल पर अंकित अब भी तुम सुनो लगाकर ध्यान कथा वह लहर- लहर दुहराती है।। हांँ पराधीन भारत का था तब, थी आग लगी जन के मन में। ‘कैसे माता…

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स्वातंत्र्यवीर सावरकर: एक समग्र मूल्यांकन

स्वातंत्र्यवीर सावरकर: एक समग्र मूल्यांकन

विनायक दामोदर सावरकर प्रखर चिंतक, गहन अध्येता, सत्यान्वेषी इतिहासकार, भावप्रवण कवि, सेवाभावी समाज सुधारक और महान स्वतंत्रता-सेनानी थे। उनका कोई भी रूप अन्य किसी रूप से कमतर नहीं था। संपूर्ण स्वतंत्रता-आंदोलन में सावरकर जैसी प्रखरता, तार्किकता एवं तेजस्विता अन्यत्र कम ही दिखाई पड़ती है। महापुरुष कभी मरते नहीं। वे हमारी स्मृतियों, प्रेरणाओं, आचरणों और आदर्शों…

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(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्वतंत्र स्तंभकार है।)

राष्ट्र चेतना, सांस्कृतिक गौरव एवं हिन्दुत्व चिंतन की प्रधानता है सावरकर जी के लेखन में

स्वातंत्र्यवीर विनायक सावरकर का पूरा जीवन राष्ट्र चेतना और सांस्कृतिक गौरव की पुनर्प्रतिष्ठा के लिये समर्पित रहा। बालवय से जीवन की अंतिम श्वाँस तक वे कभी रुके नहीं और न कहीं झुके। उनका अभियान केवल स्वतंत्रता संग्राम तक सीमित नहीं था। उनका लक्ष्य एक ऐसे सशक्त और समृद्ध भारत का निर्माण करना था जैसा अतीत…

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