भारत एक ऐसा देश है जहाँ परिवार केवल सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि जीवन का मूलाधार है। भारतीय समाज की आत्मा कुटुम्ब व्यवस्था है, जो व्यक्ति को पहचान, सुरक्षा, संस्कार और आत्मीयता प्रदान करती है। वैश्वीकरण और तकनीकी क्रान्ति के दौर में जहाँ पश्चिमी समाजों में परिवार विखण्डित होता गया, वहीं भारत में कुटुम्ब व्यवस्था ने न केवल स्वयं को सुरक्षित रखा, बल्कि समयानुसार अपने रूप और साधनों में भी परिवर्तन स्वीकार किया। आज भी हर भारतीय परिवार से गहरे सम्बन्धों के साथ जीता है। मोबाइल और डिजिटल माध्यमों को भले ही सामाजिक सम्बन्धों के क्षरण का कारण कहा जाता है, परन्तु यही तकनीक परिवार को जोड़ने का सबसे मजबूत साधन भी बनी है। स्मार्टफोन मिलते ही लोग सबसे पहले परिवार का व्हाट्सऐप समूह बनाते हैं। विवाहित व्यक्तियों के मायके, ससुराल, ननिहाल और ददिहाल के अलग-अगल समूह इसकी मिसाल हैं।
यह इस बात का प्रमाण है कि परिवार नष्ट नहीं हुआ: बल्कि नये रूपों में विस्तार पा रहा है। भारतीय संस्कृति में सम्बन्धों की भाषा ही परिवार का विस्तार है। यहाँ किसी अजनबी को भी ‘भाई साहब’, ‘बहन जी’, ‘ताई’, ‘माँ’ जैसे सम्बोधनों से पुकारा जाता है। यह सम्बोधन केवल औपचारिक नहीं, बल्कि सामाजिक आत्मीयता के प्रतीक हैं। यही सांस्कृतिक ताना-बाना परिवार को सुरक्षित रखता है इसलिये यह मान लेना कि भारत में परिवार टूट रहे हैं, वास्तविकता से दूर है।
तकनीक और परिवार बिखराव नहीं, विस्तार :
कोविड महामारी के कालखण्ड ने यह सिद्ध किया कि भारतीय परिवार भावनात्मक सुरक्षा की दृष्टि से विश्व में सर्वोच्च है। अमेरिका में रहने वाले छात्र तक प्रतिदिन वीडियो कॉल के माध्यम से अपने माता-पिता से जुड़े रहे। जूम पर सुन्दरकाण्ड या हनुमान चालीसा का पाठ किया गया, परिवारिक संवाद निरन्तर चलता रहा। यानी तकनीक दूरी मिटाने लगी, दूरी बढ़ाने का कारण नहीं बनी। यही कारण है कि भारत का युवा, जो क्वांटम कम्प्यूटर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग का नागरिक है, पारिवारिक मूल्यों को न केवल समझता है बल्कि नवाचार के साथ उसे निभाता भी है।
पश्चिम में परिवार का संकट और भारत की भूमिका
पश्चिमी देशों ने आर्थिक समृद्धि और जीडीपी वृद्धि के नाम पर परिवारों की अनदेखी की। परिणाम यह हुआ कि अमेरिका में ‘फादरलेसनेस’ यानी पिता-विहीनता एक गम्भीर समस्या बन गयी। डॉ. डेविड ब्लैकनहॉर्न जैसे समाजशास्त्रियों ने ‘फादरलेस अमेरिका’ जैसी पुस्तकों के माध्यम से चेतावनी दी कि परिवार का टूटना अमेरिका की सामाजिक समस्याओं की जड़ है। वहाँ आज सरकार तलाक ना लेने पर टैक्स में रियायत देती है- यह परिवार बचाने का कृत्रिम प्रयास है। भारत इस सन्दर्भ में विश्व को मार्गदर्शन दे सकता है, क्योंकि भारतीय समाज ने परिवार को कभी बोझ नहीं, बल्कि शक्ति माना। इसी कारण भारतीय विश्व भर में सफल हो रहे हैं- क्योंकि वे परिवार की भावनात्मक पूँजी से सशक्त होते हैं।
भारतीय कुटुम्ब व्यवस्था :
संस्कृति का आधार परिवार भारतीय सभ्यता की रीढ़ है। विद्यालयों और संस्थानों में भी ‘विद्यालय परिवार’ या ‘संस्थान परिवार’ कहा जाता है। यह परिवार-केन्द्रित दृष्टि केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का तंत्र है। रामायण का सन्दर्भस्पष्ट करता है कि परिवार में कर्तव्य सर्वोपरि है। वनगमन के समय माता कौशल्या ने राम को ‘सुरक्षित रहना’ नहीं कहा, बल्कि धर्म पालन का आशीर्वाद दिया क्योंकि धर्म ही रक्षा कर सकता है। यही परिवार का सार है- कर्तव्य, त्याग और निरन्तर देना। आज तकनीक के कारण मित्र-परिवार बढ़े हैं। विवाह की आयु बढ़ी है, माता-पिता बनने की प्रक्रिया विलम्बित हुई है, फिर भी भारतीय युवा धीरे-धीरे समझ रहे हैं कि बिना बच्चों के परिवार पूर्ण नहीं होता। ‘डबल इनकम नो किड’ जैसी अवधारणाओं से मोहभंग हो रहा है, क्योंकि अन्ततः जीवन की अर्थवत्ता परिवार और बच्चों से ही बनती है।
भविष्य के संरक्षक युवा व मातृशक्ति
भारत में परिवार के पुनर्जागरण का श्रेय युवा शक्ति और मातृशक्ति दोनों को जाता है। आज इसरो, आईसीएसआर, शिक्षा और प्रशासन- हर क्षेत्र में महिलाएँ तेजी से आगे बढ़ रही हैं। जहाँ कभी कन्या भ्रूण हत्या की घटनाएँ होती थीं, वहीं हरियाणा व बिहार में आज महिलाओं की भागीदारी सर्वाधिक है। स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि आने वाली शताब्दी मातृशक्ति की होगी। आज यह कथन सत्य सिद्ध हो रहा है। भारतीय मातृशक्ति न केवल परिवार को बल्कि संस्कृति और राष्ट्र को भी सुरक्षित रखेगी। परिवर्तनशील समाज में भारतीय कुटुम्ब व्यवस्था न तो कमजोर हुई है, न विस्थापित-वरन् आधुनिक साधनों के साथ और अधिक विस्तारित, सशक्त एवं लचीली हुई है। परिवार भारतीय संस्कृति की धुरी है, और वहीं भारत को विश्वगुरु के मार्ग पर आगे ले जाती है। परिवार की रक्षा करने की नहीं, परिवार के कर्तव्यों को निभाने की आवश्यकता है। यही भारत की स्थायी शक्ति है और यही भविष्य का मार्ग भी।
लेखक- मुकुल कानितकर