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शंख क्यों बजाया जाता है ?

अर्थववेद में लिखा है “शंखेन हत्वा राक्षसि”। अर्थात् “शंख से सब राक्षसों का नाश होता है।” यजुर्वेद में लिखा है- “अवरस्पराय शंखध्वम्” । अर्थात् “युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने हेतु शंख बजाने वाला व्यक्ति अपेक्षित है।” शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि पूजा के समय जो व्यक्ति शंख ध्वनि करता है, उसके…

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इंटरनेट, एआई और सोशल मीडिया के मकड़जाल में फँसता समाज

इंटरनेट, एआई और सोशल मीडिया के मकड़जाल में फँसता समाज

आज बिना इन्टरनेट और कृत्रिम बुद्धि के जीवन की कल्पना करना असम्भव है। इन दोनों ने मिलकर सामान्य जीवन को पहले की तुलना में सरल कर दिया है। पहले जिन कामों में घण्टों लगा करते थे, वे अब एक क्लिक में हो जाते हैं। दैनिक जीवन की आवश्यकताओं, नागरिक प्रशासन, शिक्षा, व्यवसाय, चिकित्सा, न्यायिक प्रक्रिया,…

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मन में 2047 में देश विभाजन का डर नहीं, अखंड भारत के संकल्प को मजबूत बनाएं - डॉ. मोहन भागवत जी

मन में 2047 में देश विभाजन का डर नहीं, अखंड भारत के संकल्प को मजबूत बनाएं – डॉ. मोहन भागवत जी

मुंबई, 08 फरवरी। देश विरोधी शक्तियों के देश विभाजन के मंसूबों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक जी ने कहा कि आप 2047 में देश विभाजन का डर पालने की बजाय, अखंड भारत के उदय की कल्पना करो। जो 500 साल में सुल्तान बादशाह यहां रहकर नहीं कर सके, 200 साल में अंग्रेज नहीं कर…

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"न कोई घर रहेगा, न घरवाला, न घरवाली,आखेट युग आ गया है"- विद्यानिवास मिश्र जी

“न कोई घर रहेगा, न घरवाला, न घरवाली,आखेट युग आ गया है”- विद्यानिवास मिश्र जी

डॉ. विद्यानिवास मिश्र “न कोई घर रहेगा, न घरवाला, न घरवाली/ सब होंगे आखेटक/ सब होंगे आखेट / आखेट युग आ गया है, जहाँ घर नहीं होते।” ये कहना था विद्यानिवास मिश्र जी का क्योंकि मिश्र जी ऐसे लेखक थे जो आज के मनुष्य की त्रासदी के बारे में दो टूक कहने से भी नहीं…

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विविधता वास्तव में एकता का शृंगार और उत्सव है, न कि विभाजन का कारण – डॉ. मोहन भागवत जी

विविधता वास्तव में एकता का शृंगार और उत्सव है, न कि विभाजन का कारण – डॉ. मोहन भागवत जी

जोधपुर जैसलमेर की पावन धरा पर ‘समरसता’ का शंखनाद; चादर महोत्सव में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी, संत जनों और सर्व समाज का महासंगम जैसलमेर, राजस्थान। स्वर्ण नगरी जैसलमेर में दादा गुरुदेव आचार्य श्री जिनदत्त सूरी के 871वें चादर महोत्सव के अवसर पर सामाजिक समरसता का अनुपम दृश्य देखने को मिला। इस पावन अवसर पर…

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श्री गुरुतेगबहादुर जी - भारतीय परंपरा के दैदीप्यमान नक्षत्र

श्री गुरुतेगबहादुर जी – भारतीय परंपरा के दैदीप्यमान नक्षत्र

माननीय सरकार्यवाह जी का वक्तव्य सिख परम्परा के नवम गुरु, श्री गुरुतेगबहादुर जी की शहादत के 350 वें प्रेरणादायी दिवस पर इस वर्ष विभिन्न धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं सहित भारत के सम्पूर्ण समाज द्वारा श्रद्धा एवं सम्मान के साथ अनेकानेक कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा है। संघर्ष के उस कालखंड में भारत का अधिकांश भू-भाग विदेशी शासक औरंगजेब के…

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राजा लक्ष्मण सिंह हिन्दी भाषा के प्रखर समर्थक

विशुद्ध हिन्दी के समर्थक राजा लक्ष्मण सिंह: हिन्दी गद्य के महान निर्माता

उन्नीसवीं शताब्दी का उत्तरार्ध हिन्दी भाषा के विकास और उसकी पहचान का महत्वपूर्ण काल था। इसी समय राजा लक्ष्मण सिंह जैसे विद्वान साहित्यकार, अनुवादक और भाषा-चिन्तक सामने आए, जिन्होंने हिन्दी को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा माना। जब हिन्दी और उर्दू के स्वरूप को लेकर व्यापक बहस चल रही थी,…

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संघ के विस्तार का अर्थ राष्ट्रीय विचार का विस्तार – दत्तात्रेय होसबाले जी, सरकार्यवाह

संघ के विस्तार का अर्थ राष्ट्रीय विचार का विस्तार – दत्तात्रेय होसबाले जी, सरकार्यवाह

देश के नागरिकों का औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होना आवश्यक; भारतीय विमर्श समस्त विश्व के कल्याण का विचार समालखा (पानीपत), 15 मार्च 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तीन दिवसीय अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा की बैठक संगठन कार्य में विस्तार, राष्ट्रहित में समाज की सज्जन शक्ति की अधिक सक्रियता और सामाजिक समरसता के संकल्प के साथ…

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संघ का किसी से कोई द्वेष नहीं, सबके साथ संवाद की भावना – सुनील आंबेकर जी

संघ का किसी से कोई द्वेष नहीं, सबके साथ संवाद की भावना – सुनील आंबेकर जी

नागपुर, 29 मई 2026। नागपुर में पत्रकारों व संपादकों की विशेष संगोष्ठी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर जी ने कहा कि राजनीतिक स्वार्थों के कारण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में अक्सर कई तरह की गलत जानकारी फैलाई जाती है। लेकिन, असल में संघ किसी से द्वेष नहीं करता…

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सनातन संस्कृति में संस्कारों का महत्व

सनातन संस्कृति में संस्कारों का महत्व

सनातन संस्कृति में संस्कारों का बड़ा महत्व है। संस्कारों की सम्पन्नता से शारीरिक, मानसिक आदि सभी परिशुद्धियाँ (पूर्ण शुद्धि) होती हैं। मानव जीवन को शुद्ध करने की चरणबद्ध प्रक्रिया का नाम संस्कार है। लौकिक जीवन में मनुष्य आनन्द का संचय करते हुए त्रुटि रहित परम लक्ष्य की प्राप्ति संस्कारों से ही करता है। ऐसे में…

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