हवन-तीर्थ-कीर्तन-दर्शन के चार पहियों पर हिन्दू धर्म की बैलगाड़ी चलती है और चलती रहेगी निरन्तर
हवन-तीर्थ-कीर्तन-दर्शन के चार पहियों पर हिन्दू धर्म की बैलगाड़ी चलती है और चलती रहेगी निरन्तर

हवन-तीर्थ-कीर्तन-दर्शन के चार पहियों पर हिन्दू धर्म की बैलगाड़ी चलती है और चलती रहेगी निरन्तर

यह स्थापना हिन्दी के प्रख्यात ललित निबन्धकार आचार्य कुबेरनाथ राय की भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी आस्था और उनकी मौलिक चिन्तन-दृष्टि को प्रकट करती है। भारतीयता, सनातन धर्म, लोकजीवन और विश्वबन्धुत्व जैसे विषयों पर उन्होंने अपने निबन्धों के माध्यम से गम्भीर तथा ललित भाष्य प्रस्तुत किए। हिन्दी साहित्य की आधुनिक विधा ललित निबन्ध को समृद्ध करने वाले कुबेरनाथ राय ने अपने लेखन में भारतीय संस्कृति और भारतीय चिन्तन के विविध पक्षों की पहचान तथा व्याख्या की है।

हिन्दी साहित्य की एक महत्वपूर्ण आधुनिक विधा ललित निबन्ध के क्षेत्र में अपने विशिष्ट योगदान के लिए पहचाने जाने वाले आचार्य कुबेरनाथ राय का जन्म 26 मार्च 1933 को गाजीपुर, उत्तर प्रदेश के मतसा नामक गाँव में हुआ था। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा प्राप्त कर वे पहले नलबारी, असम और फिर गाजीपुर में उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अध्यापन कार्य से जुड़े रहे।

आधुनिक भारत के ब्रह्मर्षि

कुबेरनाथ राय आधुनिक भारत के ब्रह्मर्षि थे। उन्होंने मराल, प्रिया नीलकंठी, रस आखेटक, गंधमादन, निषाद बांसुरी, विषाद योग, पर्णमुकुट, महाकवि की तर्जनी, पत्र मणिपुतुल के नाम, किरात नदी में चन्द्रमधु, मनपवन की नौका, दृष्टि अभिसार, त्रेता का वृहत्साम, कामधेनु और रामायण महातीर्थम शीर्षक से निबन्ध संग्रह लिखे। उन्हें भारतीय ज्ञानपीठ के ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया था। इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश शासन द्वारा उनके निबन्ध संकलन प्रिया नीलकंठी, गंधमादन और विषाद योग को भी पुरस्कृत किया गया था। उनके निबन्ध भारतीयता, सनातन धर्म और विश्वबन्धुता के उच्च कोटि के दार्शनिक, साहित्यिक और ललित भाष्य हैं।

भारत की नयी संकल्पना

आचार्य कुबेरनाथ राय ने का मानना था कि भारतीयता एक संयुक्त उत्तराधिकार है, जिसके रचनाकार आर्यों के अलावा द्रविड़, निषाद और किरात भी हैं। उन्होंने भारतीय अवधारणा में नगरीय सभ्यता, कला-शिल्प और भक्तियोग जैसे तत्त्वों को द्रविड़ों की देन माना है। उन्होंने अपने निबन्धों में वृहत्तर भारत की संकल्पना को मूर्त रूप दिया। प्राचीन भारत का विस्तार स्याम, जावा, सुमात्रा, मलाया, कम्बोडिया, मलेशिया और इंडोनेशिया तक रेखांकित करते हैं तथा इसका साक्ष्य विभिन्न वाङ्मय और ऐतिहासिक उदाहरणों से प्रस्तुत करते हैं। वे ऐसे अनेक द्वीपों के साक्ष्य देते हैं, जहाँ भारतीयता की छाप विद्यमान है।

अपने एक निबन्ध ‘स्नान : एक सहस्त्रशीर्षा अनुभव’ में कुबेरनाथ राय लिखते हैं—

“भोगों में स्नान और विद्याओं में दर्शनशास्त्र, इन दो के प्रति इस जाति का घनघोर प्रेम की सीमा को पार कर गया है। यह जाति प्रत्येक कर्म के पूर्व स्नान करती है और प्रत्येक कर्म के पीछे दार्शनिक युक्ति खोजती है। इस स्नान प्रेम का मूल उद्गम वर्तमान भारतीय जाति की आदि संस्कृति निषाद संस्कृति में है। निषादों की स्नान शैली थी अवगाहन अर्थात नदी या सरोवर में स्नान। द्रविड़ों ने जन्म-मज्जन-मार्जन को स्नानागारों में स्थान दिया और स्नान का रूप अवगाहन से प्रक्षालन हो गया।”

कुबेरनाथ राय स्थापना देते हैं कि—

“आर्यों की अग्नि उपासना अर्थात यज्ञ का रूपान्तर हुआ ‘हवन’। निषादों और द्रविड़ों का स्नान प्रेम बना ‘तीर्थ’। द्रविड़ों की भाव-साधना बनी ‘कीर्तन’ या ‘भजन’ और आर्यों की चिंतनशीलता बनी ‘दर्शन’। इस प्रकार हवन-तीर्थ-कीर्तन-दर्शन के चार पहियों पर हिन्दू धर्म की बैलगाड़ी चल पड़ी और चलती रहेगी निरन्तर।” वे मानते थे कि आरण्यक शिल्प और कला-संस्कारों में किरातों का मूल है तथा आर्यों के मूल में निषाद हैं। उनका मानना था कि भारतीय धरती के आदि मालिक निषाद ही थे। गंगा मूलतः निषादों की नदी है और ‘गंगा’ शब्द भी निषादों की देन है।

गांधीवादी चिन्तन

कुबेरनाथ राय ने अपनी अनुजवधू मणिपुतुल को सम्बोधित करते हुए कुछ पत्र-शैली में निबन्ध लिखे हैं। यह संग्रह गांधीवादी चिंतन की विशिष्टताओं को उद्घाटित करता है। इसके निबन्धों में उन्होंने गांधीजी के विभिन्न पहलुओं पर ललित शैली में विचार किया है। ‘पाँत का आखिरी आदमी’, ‘शान्तम्, सरलम्, सुन्दरम्’, ‘वह रसमय पुरुष थे’, ‘स्वच्छ और सरल’ आदि इसके विशिष्ट निबन्ध हैं।

उस संग्रह के अन्तिम निबन्ध ‘वे एक सही हिन्दू थे’ में वे जवाहरलाल नेहरू को आधुनिक हिन्दू और गांधी को ‘सही’ हिन्दू बताते हैं। वे कहते हैं कि गांधी में जो सद्भावना है, उसके मूल में हिन्दू होना ही है। यदि गांधीजी हिन्दू न होते या भारतीय न होते, तो उनकी चिन्ता और कर्म-पद्धति के अंग-प्रत्यंग में ऐसी एकसूत्रता या ‘हार्मनी’ नहीं आ पाती। हिन्दू होने के कारण ही उनकी चिन्तन-पद्धति का रूप संकेन्द्रित वृत्तों का है। वे मानते हैं कि गांधीजी का समन्वयात्मक दृष्टिकोण उनके सही हिन्दू होने का सुपरिणाम है।

आचार्य कुबेरनाथ राय जी की जमीन के प्रति यह संलग्नता उन्हें अत्यन्त आत्मीय निबन्धकार और सच्चा भारतवादी बनाती है। विद्वता के साथ जमीनी जुड़ाव का यह समन्वय उनके निबन्धों को विशिष्ट ललित स्वरूप प्रदान करता है। अपने निजी जीवन में भी वे अत्यन्त हँसमुख और चुटीली बात करने वाले व्यक्तित्व के स्वामी थे।

मृत्यु

5 जून 1996 को गाजीपुर में अपने पैतृक आवास पर ही कुबेरनाथ राय का देहावसान हुआ। उन्होंने अपने निबन्धों में भारतीय संस्कृति और भारतीय चिन्तन के विभिन्न पक्षों की पहचान और व्याख्या की है। अपने जीवनकाल में तीन सौ से अधिक निबन्ध लिखे, जो विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे और साहित्य तथा संस्कृति की दुनिया में कार्य करने वाले लोगों के बीच अत्यन्त सराहे गए।

कुबेरनाथ राय की 21 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ‘कामधेनु’ निबन्ध संग्रह पर उन्हें ज्ञानपीठ की ओर से साहित्य के क्षेत्र में दिया जाने वाला महत्वपूर्ण ‘मूर्तिदेवी पुरस्कार’ प्रदान किया गया था। उनकी रचनाएँ भारत ही नहीं, विश्व के विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित की गई हैं तथा उनके विभिन्न भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं। उनके साहित्य पर अनेक विश्वविद्यालयों में शोध कार्य हुए हैं और शोधकर्ताओं को शोध-उपाधियाँ प्रदान की गई हैं।

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