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Swatantrya Veer Savarkar : भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चमकते सितारे विनायक दामोदर सावरकर

Swatantrya Veer Savarkar : एक कल्पना कीजिए…तीस वर्ष का पति जेल की सलाखों के भीतर खड़ा है और बाहर उसकी वह युवा पत्नी खड़ी है, जिसका बच्चा हाल ही में मृत हुआ है…

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अमर बलिदानी कैप्टन विक्रम बत्रा (जन्मदिवस- 9 सितम्बर 1974) मैं लौटकर आऊँगा, अगर तिंरगा लहराकर नहीं लौटा तो तिरंगे में लिपटकर लौटूंगा, लेकिन मैं लौटकर आऊँगा जरुर...ये शब्द है कारगिल युद्ध के उस जाबांज सिपाही के जिन्होंने मात्र 24 साल की उम्र में अपने जीवन का बलिदान दे दिया। मात्र 24 साल की उम्र में हिंद की सरहद की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा लहराने वाले पहले एशियाई कैप्टन विक्रम उर्फ शेरशाह बत्रा का जन्म 1974 में हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में एक खत्री परिवार में हुआ। माता-पिता ने भारत की सेना के सबसे तगड़े योद्धा का नाम विक्रम रखा। अमर शहीद कैप्टन विक्रम बत्रा ने बचपन में ही भारतीय सेना में जाने का मन बना लिया था और हर साल स्कूल में 15august और 26january को फौजी यूनिफॉर्म पहनकर स्कूल की परेड में शामिल हो जाया करते थे। माता-पिता ने भी विक्रम के सपने को साकार करने में उनका पूरा साथ दिया। सन 1995 विक्रम सेना भर्ती की तैयारी करने के लिए चंडीगढ़ आए, यहां उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय में अंग्रेजी विषय में एडमिशन लिया ताकि वो संयुक्त रक्षा सेवा नामक एक सैनिक परीक्षा पास कर सके, आखिर जिद, जुनून और मेहनत की जीत हुई और मात्र एक साल बाद विक्रम ने रात-दिन की कड़ी मेहनत से संयुक्त रक्षा सेवा परीक्षा पास कर ली। यहीं से साल 1995 में विक्रम के लिए नए जीवन की शुरुआत हुई वे देहरादून में भारतीय सैन्य अकादमी में आए और अगले 19 महीनों तक उनको कठिन ट्रेनिंग ली। दरअसल, सरकार ने पहले ही सोच लिया था कि, विक्रम वत्रा की बटालियन को तैयार करके कश्मीर भेजना है इसलिए अन्य सैनिकों के मुकाबले ज्यादा कठिन ट्रेनिंग दी गई। ट्रेनिंग के दौरान हर उस तकलीफ और दर्द से उनको वाकिफ करवाया गया जो उन्हें आगे झेलना होगा। इस तरह छह दिसंबर तक 1997 को 19 महीनों की लगातार कठिन ट्रेनिंग के बाद विक्रम बत्रा भारतीय सेना में जम्मू-कश्मीर में सेवाएं देने के लिए लेफ्टिनेंट के पद पर तैनात कर दिए गए और उन्होंने अपने पिता को फोन कर कहा कि, मां ने मुझे अपने कंधों पर बैठा लिया है। और यही से शुरु हुआ विक्रम बत्रा का कैप्टन बत्रा बनने का सफर। सेना में भर्ती के बाद ही 1998 में विक्रम अपने जीवन में पहली बार कश्मीर पहुंचे। उस वक्त कश्मीर घाटी खून से लथपथ थी चारों तरफ आतंक का साया था। गोलियों की आवाजों से सुबह होती थी और बम धमाकों से रात। विक्रम की पहली पोस्टिंग कश्मीर के बारामुला जिले के सोपोर में हुई। ये पूरा इलाका आतंक का गढ़ था। पोस्टिंग के दौरान बत्रा को सैनिक बटालियन के साथ जंगलों में भेजा गया जहां उनकी आतंकवादियों से सीधी मुठभेड़ हुई। रात के घोर अंधेरे बर्फीले जंगलों में विक्रम पहली बार आतंक का सामना कर रहे थे कि तभी एक गोली आई जो सीधे उनके कंधों से गुजरकर उनके पीछे खड़े एक सिपाही को जा लगी। इस घटना से विक्रम ने गंभीर होकर अपनी बटालियन को पूरे जंगल में फैला दिया उस रात उन्होंने करीब 57 आतंकवादियों को मार डाला। लेफ्टिनेंट विक्रम बत्रा की अगुवाई में कश्मीर में बड़े आतंकी गिरोह का खात्मा कर दिया गया उनके नेतृत्व में लगातार 12 आतंकी ठिकानों को तबाह कर भारतीय सेना ने कश्मीर में एक बड़े हिस्से को अपने नियंत्रण में ले लिया। विक्रम अक्सर छुट्टियों में अपने घर आया करते थे और अपनी प्रेमिका डिंपल चीमा के साथ अपने होने वाले बच्चों और बुढ़ापे की बातें किया करते थे। साल 1999 में अंतिम बार विक्रम होली के दिन अपने घर आए तब उनके एक मित्र ने विक्रम से कहा युद्ध के समय तुम आगे मत रहना तब विक्रम ने कहा मैं तो विजई होकर कश्मीर की चोटी पर भारत का झंडा फहराऊँगा या फिर उसी तिरंगे में लिपटकर, लौट आऊंगा जरूर... 3 जून 1999 की सुबह लेफ्टिनेंट बत्रा को टीवी से खबर मिली कि, पाकिस्तानी सेना कश्मीर की घाटियों में घुस आई है साथ ही हजारों पाकिस्तानी सैनिकों को स्थानीय लोगों ने अपने घरों में छुपा रखा है इतना सुनकर विक्रम अपनी छुट्टियों को पूरा किए बगैर ही कश्मीर के लिए रवाना हो गए उन्होंने अपने माता-पिता दोस्तों और अपनी प्रेमिका से अंतिम बार मुलाकात की साथ ही अपने खून से अपनी प्रेमिका की मांग भर दी। शायद उन्हें ये एहसास हो चुका था कि ये उनकी आखिरी मुलाकात है, 5 जून की सुबह दिल्ली से आदेश के तहत विक्रम बतरा को मेजर योगेश कुमार जोशी के नेतृत्व में ग्रास के पर्वतों पर भेज दिया गया। ग्रास का पर्वत हिंदुस्तान का सबसे ऊंचा व दुनिया का सर्वाधिक बर्फ़ीला पर्वत था इस पर्वत के अगले पार हजारों की संख्या में पाकिस्तानी सैनिक और आतंकवादी भारत की सरहदों को छलनी कर रहे थे साथ ही घाटी के कुछ गद्दार अपने ही सैनिकों पर पत्थर बरसा रहे थे कुल मिलाकर भारतीय सेना के लिए यह सबसे मुश्किल वक्त था चारों तरफ मौत थी परंतु मौत को मात देने की ताकत भारत के वीरों में थी। विक्रम बत्रा का विजय घोष था...दुर्गा माता की जय और अगली चोटी पर चढ़ाई करने से पहले उनको दिल मांगे मोर युद्ध घोष देना था। उनका कोड नाम शेरशाह रखा गया। 6 जून की रात को ही मेजर जोशी ने अपने योद्धाओं को कश्मीर के अलग-अलग इलाकों में उतार दिया। घोर रात्रि में लेफ्टिनेंट बत्रा अपनी बटालियन के साथ द्रास के पर्वतों से आगे की ओर बढ़े। उन्होंने पॉइंट 5140 पर्वत पर चढ़ाई करना आरंभ किया ऊपर से पाकिस्तानी सेना गोलियां बरसा रही थी। नीचे हजारों फीट गहरी खाई और चट्टानों पर भारी फिसलन, फिर भी वीरों ने पॉइंट 5140 पर अपनी दस्तक दे दी। लेफ्टिनेंट बत्रा ने इस इलाके में हाथ बम बरसाने शुरू कर दिए साथ ही आठ दुश्मनों को मार गिराया। जवाब में पाकिस्तान की तरफ से उन पर पत्थर बरसाए गए जिससे वे घायल हो गए। रात में भारतीय वीरों ने 03:54 पर ने पॉइंट 5140 पर तिरंगा लहरा दिया है। अगली सुबह 04:35 पर विक्रम बत्रा ने अपने अधिकारियों को फोन कर बताया कि, सर हमारे योद्धाओं ने कहर मचा दिया है हमारा एक भी वीर शहीद नहीं हुआ है। बल्कि हमने चोटी पर तिरंगा फहरा दिया है सर ये दिल मांगे मोर। मेजर जोशी ने खुश होते हुए पहली बार लेफ्टिनेंट बत्रा को कैप्टन कहते हुए कहा, कैप्टन साहब आगे बढिए... ये दिल मांगे मोर...तुरंत ही सुबह पांच बजे सेना अध्यक्ष वेद प्रकाश मलिक ने उन्हें फोन करके उन्हें कैप्टन के पद पर पदोन्नत कर दिया। सुबह पांच बजकर 45 मिनट पर कैप्टन बत्रा अपने वीरों के साथ 16 हजार फीट ऊंची मुस्कोह घाटी की तरफ बढ़ने लगे, उन्होंने तेज बुखार और थकान होने के बावजूद पहली चढ़ाई शुरु की। 7 जुलाई की दोपहर में कैप्टन बत्रा प्वाइंट 4875 ऊँचाई पर पहुंचे। कुछ ही दूरी पर पाकिस्तान के सैनिक तैनात थे, इस पूरे दिन और रात तक पाकिस्तानी सैनिकों ने कैप्टन बत्रा को काफिर कहा, इतना ही नहीं उनकी धार्मिक आस्था और देवताओं को भला-बुरा कहा। इससे कैप्टन बत्रा गुस्से से बौखला गए और उन्होंने हैंड ग्रेनेड के साथ लगातार गोलियां बरसानी शुरू कर दी। कैप्टन बत्रा ने अपनी बटालियन को पीछे छोड़ अकेले ही आगे बढ़ पाकिस्तानी बंकरों में बम बरसाने शुरू कर दिए और इतने आगे बढ़ गए कि, पाकिस्तानी सैनिकों से हाथापाई करने लगे। उनको दुश्मन सैनिकों ने पीछे से पकड़ लिया। अकेले ही कैप्टन बत्रा ने तीनों दुश्मनों को मार गिराया। दुश्मनों ने लगातार कैप्टन विक्रम बत्रा को निशाना बनाकर गोलियां चलानी शुरु कर दीं। अपने सैनिकों को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया ही था कि, कैप्टन विक्रम के सीने में दुश्मन की एक गोली जा लगी जिससे कैप्टन विक्रम बत्रा अपने घायल सिपाहियों की बगल में जा गिरे और वहीं दम तोड़ दिया उनके मुख से निकले अंतिम शब्द थे दुर्गा का माता की जय...और इस तरह देश का एक वीर जवान देश के लिए 7 जुलाई 1999 को अपने जीवन का बलिदान दे दिया। इधर, अपने कैप्टन की मौत से बटालियन इतना बौखला गयी कि, प्रतिशोध में मां दुर्गे की ललकार देते हुए दुश्मन सेना के परखच्चे उड़ा दिए और प्वाइंट 4875 पर तिरंगा लहरा कर ही दम लिया। इस तरह पूरी शान से हिंद की सेना ने कारगिल युद्ध विजय किया समस्त चोटियों पर तिरंगा लहरा दिया। कैप्टन साहब क बलिदान के बाद उनके नाम को परमवीर चक्र से नवाजा गया।

कैप्टन विक्रम बत्रा : “ये दिल मांगे मोर” कहकर कारगिल में रचा शौर्य का इतिहास

मैं लौटकर आऊँगा, अगर तिंरगा लहराकर नहीं लौटा तो तिरंगे में लिपटकर लौटूंगा, लेकिन मैं लौटकर आऊँगा जरुर…ये शब्द है कारगिल युद्ध के उस जाबांज सिपाही के जिन्होंने मात्र 24 साल की उम्र में अपने जीवन का बलिदान दे दिया। मात्र 24 साल की उम्र में हिंद की सरहद की सबसे ऊंची चोटी पर तिरंगा…

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जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण यूरोप सहित अन्य देश सभ्यतागत संकट का सामना कर रहे

जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण यूरोप सहित अन्य देश सभ्यतागत संकट का सामना कर रहे

काशी। प्रज्ञा प्रवाह एवं दीनदयाल उपाध्याय पीठ के संयुक्त तत्वाधान में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित समाज विज्ञान संकाय के सभागार में आयोजित ”जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के कारण सभ्यतागत संकट व्याख्यान में प्रज्ञा प्रवाह के अखिल भारतीय सह संयोजक चन्द्रकांत जी ने कहा कि जनसांख्यिकीय परिवर्तन से सभ्यतागत संकट यूरोप में विकराल रूप धारण कर रहा है।…

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संघ का निर्माण भारत को केंद्र में रखकर हुआ है और इसकी सार्थकता भारत के विश्वगुरु बनने में है - डॉ. मोहन भागवत जी

संघ का निर्माण भारत को केंद्र में रखकर हुआ है और इसकी सार्थकता भारत के विश्वगुरु बनने में है – डॉ. मोहन भागवत जी

नई दिल्ली, 26 अगस्त। संघ शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित तीन दिवसीय व्याख्यानमाला के प्रथम दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि संघ का निर्माण भारत को केंद्र में रखकर हुआ है और इसकी सार्थकता भारत के विश्वगुरु बनने में है। संघ कार्य की प्रेरणा संघ प्रार्थना के अंत में…

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स्वदेशी ऊर्जा की ओर बढ़ता भारत: रूफटॉप सोलर में लखनऊ बना देश का नंबर 1 शहर

लखनऊ, उत्तर प्रदेश स्वदेशी ऊर्जा को बढ़ावा देने की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए लखनऊ देश का नंबर 1 शहर बन गया है, जहां रूफटॉप सोलर इंस्टॉलेशन की संख्या 87,000 के पार पहुंच चुकी है। यह उपलब्धि न केवल शहर के लिए, बल्कि पूरे देश के लिए स्वच्छ और आत्मनिर्भर ऊर्जा की…

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डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : महान दार्शनिक, शिक्षक और राष्ट्रनायक की प्रेरक जीवनगाथा

डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन : महान दार्शनिक, शिक्षक और राष्ट्रनायक की प्रेरक जीवनगाथा

घोड़े अलग-अलग रूप-रंग के होते हैं, पर गधे एक जैसे होते हैं। अलग-अलग रंग और विविधता विकास के लक्षण हैं। ये जवाब डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने एक अंग्रेज को दिया था। दरअसल, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन एक बार भारतीय दर्शन पर व्याख्यान देने इंग्लैंड गए थे, तब वहां बड़ी संख्या में लोग उनका भाषण सुनने आए…

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अस्सी घाट की गंगा आरती भी कराएगा विश्वनाथ मंदिर प्रशासन

अस्सी घाट की गंगा आरती भी कराएगा विश्वनाथ मंदिर प्रशासन

गंगा आरती की समितियों ने कहा-लिखित में कोई प्रस्ताव नहीं, पीएम मोदी तक भी उठाएंगे ये मुद्दा वाराणसी। अस्सी घाट की गंगा आरती की भी जिम्मेदारी श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर प्रशासन को देने की तैयारी शुरू हो गई है। यहां भी नमो घाट और ललिता घाट की तर्ज पर वैतनिक अर्चकों से ही गंगा आरती कराने…

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पत्रकार की लेखनी में भारत निर्माण का भाव होना आवश्‍यक : सुभाष जी

‘एक पत्रकार ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ की भावना के साथ पत्रकारिता करके लोकमंगल का आह्वान करता है। पत्रकार अपनी कार्यशैली से समाज का मार्गदर्शन करने का कार्य करता है। उसकी लेखनी में भारत निर्माण का भाव होना चाहिये।’

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बौद्ध दर्शन की भाषा संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के डॉ.आंबेडकर के प्रस्ताव पर अचरज कैसा?

बौद्ध दर्शन की भाषा संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने के डॉ.आंबेडकर के प्रस्ताव पर अचरज कैसा?

ऐसी है संस्कृत की समृद्ध परंपरा. किसी एक धर्म या दर्शन का इस पर अधिकार नहीं रहा. ब्राह्मण दर्शन है, तो बौद्ध दर्शन भी है. नास्तिक दर्शन भी है. वेदों की प्रशस्ति है तो उसे धूर्त भांडों की रचना भी इसी जुबान में कहा गया है. यहाँ अर्थशास्त्र और कामशास्त्र भी है. मेघदूत और अभिज्ञान…

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कांग्रेस अध्यक्ष के घृणास्पद बयान को लेकर आरएसएस ने दिसपुर एवं सिलचर पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराई

कांग्रेस अध्यक्ष के घृणास्पद बयान को लेकर आरएसएस ने दिसपुर एवं सिलचर पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराई

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा दक्षिण असम में आयोजित चुनावी रैली के दौरान दिए गए कथित अपमानजनक, उकसावेपूर्ण एवं साम्प्रदायिक रूप से संवेदनशील बयान को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की उत्तर असम प्रांत एवं दक्षिण असम प्रांत इकाइयों ने विधिक कार्रवाई की मांग करते हुए क्रमशः दिसपुर पुलिस थाना तथा सिलचर पुलिस थाना में…

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